साहित्य

हिंदी भवन में ‘नवभारत का न्याय दर्शन’ का विमोचन, नए आपराधिक कानूनों को सरल भाषा में समझाएगी पुस्तक

केंद्रीय मंत्री डॉ. राजभूषण चौधरी समेत कई दिग्गज रहे मौजूद; दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुमित कुमार मिश्र की पुस्तक को मिली सराहना नई दिल्ली। देश की नई आपराधिक न्याय व्यवस्था पर आधारित पुस्तक ‘नवभारत का न्याय दर्शन’ का भव्य विमोचन सोमवार को नई दिल्ली के हिंदी भवन में आयोजित समारोह में हुआ। पुस्तक का लोकार्पण […]

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समवेत संस्थानम स्क्रिप्ट राइटिंग इंटर्नशिप का समापन, प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित

दरभंगा, 20 जून।(सुरज ठाकुर) समवेत संस्थानम 1 जून से 20 जून तक आयोजित स्क्रिप्ट राइटिंग एवं रंगमंच प्रशिक्षण इंटर्नशिप कार्यक्रम का शुक्रवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ। कार्यक्रम के अंतिम दिन प्रतिभागियों के बीच प्रमाण-पत्र का वितरण किया गया। इस अवसर पर विद्यार्थियों में उत्साह और खुशी का माहौल देखने को मिला। समवेत संस्थानम:-8298609057   20 […]

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कविता : हे मात… (आशीष दीक्षित)

हे मात घृती, श्री, विवेक विद्या और वाणी में भी परा वाक् तुम्हारा है ऐसा ऐश्वर्य कि, शिशु है इससे विस्मित और अवाक्, हे माता हो सृजन की अधिष्ठात्री, कभी बन जाती हो शरद पूर्णिमा और कभी अमावस की घोर रात्रि ! हे मात शुद्ध व निश्छल बाल प्रेम, कर लेती हो तुम आत्मसात, विह्वल […]

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कविता : स्त्री और प्रकृति (आशीष दीक्षित)

स्त्री और प्रकृति स्त्री एवं प्रकृति, प्रकृति एवं स्त्री, वास्तव में दोनों एक ही है, परंतु भाव एवं रूप अनेक हैं, स्त्री है मानव के अत्यंत निकट, बोलती और सुनती हुई प्रकृति और प्रकृति है मानव का पालन-पोषण करती हुई मूक स्त्री, समाज में स्त्री जितनी स्वतंत्र होगी और शक्तिशाली होगी, प्रकृति उतनी पुष्पित और […]

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कविता : औरत… (राजदा खातून)

महिला दिवस की शुभकामनाएं… औरत… औरत वह है जो खुद तो दर्द सहती है, लेकिन दूसरों को अपनी खुशी ही बताती है। औरत वह समुद्र है, जिसके प्यार को कोई पूरी तरह समझ न सका। वह दर्द सहती है, मार भी खाती है, ताने भी सहती है, लेकिन फिर भी खड़ी रहती है, अपने परिवार […]

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कविता : स्त्रीत्व व सृजन (आशीष दीक्षित)

स्त्रीत्व व सृजन स्त्रीत्व है सम्पूर्ण स्वयं में है परिपूर्ण उसे नहीं किसी की चाह उसे नहीं किसी की परवाह परन्तु सृजन उसके प्राणों में है किन्तु सृजन उसकी श्वासों में है और सृजन क्षमता का दुरुपयोग ही उसे बना देता है अत्यन्त दीन कर देता है उसके जीवन को रस विहीन सृजन ऊर्जा का […]

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कविता : मुक्तिमार्ग (आशीष दीक्षित)

मुक्तिमार्ग ओ जीवन के कर्णधार माना कि तुम हो निर्विकार, और ये भी कि तुम हो निराकार परन्तु मेरे तीक्ष्ण समर्पण का भाव, और इसमें मिश्रित आनुपातिक विकार कर ही लेगा तुमको साकार ताकि तुम्हारे उज्ज्वल प्राकट्य को जी-भर देख सके यह संसार जो कहता फिरता है चहुंओर अभी कि अभिकल्पना तुम्हारी है केवल असार […]

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कविता : ये ओहदेदार… (नागेंद्र सिंह चौहान)

ये ओहदेदार •••••••••••••••••• ये जो कुछ ओहदेदार हैं न हमको आदि इत्यादि समझने लगे हैं। जाने कैसे भूल गए ये लोग कल आदि थे कल फिर इत्यादि होंगे। नशा कुर्सी में है शायद देखो, वो एकदम मदांध हो गए हैं। नदारत होंगे उनके सारे चिंटू एक दिन जब ओहदेदार ही न रहेंगे। हम कोई गर्म […]

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कविता : आज यूं ही मन उदास है… (संध्या सिंह)

आज यूँ ही मन उदास है हालांकि सारे अपने भी पास हैं रात थोड़ा और गहराई हर तरफ खामोशी सी छाई नींद ने फिर हमसे किनारा कर लिया आँख बंद कर ख्याल तुम्हारा कर लिया साँसों की लय थोड़ा धीमी है मुस्कान भी आज कुछ भीनी है आखों का दर्द छलक के बह गया फिर […]