साहित्य

कविता : स्त्रीत्व व सृजन (आशीष दीक्षित)

स्त्रीत्व व सृजन

स्त्रीत्व है सम्पूर्ण
स्वयं में है परिपूर्ण
उसे नहीं किसी की चाह
उसे नहीं किसी की परवाह
परन्तु सृजन उसके प्राणों में है
किन्तु सृजन उसकी श्वासों में है
और सृजन क्षमता का दुरुपयोग ही
उसे बना देता है अत्यन्त दीन
कर देता है उसके जीवन को रस विहीन
सृजन ऊर्जा का सद्उपयोग,
उसे देता है सतीत्व
और सतीत्व में बदल जाता है उसका स्त्रीत्व
परन्तु सृजन केवल पार्थिव नहीं होता
अपार्थिव सृजन भी स्त्री के आंचल में है सोता
पार्थिव या अपार्थिव सृजन का चयन भी स्त्री का अधिकार है
अपार्थिव सृजन देता है सिद्धि व प्रसिद्धि
और पार्थिव सृजन का परिणाम परिवार है
परन्तु सृजन ऊर्जा का दुरुपयोग है गंभीर पाप
और यही स्त्रीत्व के लिये है एक मात्र शाप.

 

आशीष दीक्षित

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