साहित्य

कविता : ये ओहदेदार… (नागेंद्र सिंह चौहान)

ये ओहदेदार
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ये जो कुछ ओहदेदार हैं न
हमको आदि इत्यादि समझने लगे हैं।
जाने कैसे भूल गए ये लोग
कल आदि थे कल फिर इत्यादि होंगे।

नशा कुर्सी में है शायद
देखो, वो एकदम मदांध हो गए हैं।
नदारत होंगे उनके सारे चिंटू
एक दिन जब ओहदेदार ही न रहेंगे।

हम कोई गर्म बवंडर तो हैं नहीं
जो अपनी जमीन छोड़ गुजरने को हैं।
हम ठहरे सुगंधित समीर जैसे
महकते थे हम सदा महकते ही रहेंगे।

 

नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान

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