स्त्रीत्व व सृजन स्त्रीत्व है सम्पूर्ण स्वयं में है परिपूर्ण उसे नहीं किसी की चाह उसे नहीं किसी की परवाह परन्तु सृजन उसके प्राणों में है किन्तु सृजन उसकी श्वासों में है और सृजन क्षमता का दुरुपयोग ही उसे बना देता है अत्यन्त दीन कर देता है उसके जीवन को रस विहीन सृजन ऊर्जा का […]
साहित्य
कविता : सतरंगी सपने… (नागेंद्र सिंह चौहान)
सम्मानित दोस्तों, पढ़िए, मेरी एक और ताजातरीन रचना… यह कविता देश के उन सभी बच्चों को समर्पित है जो हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण हुए हैं या फिर जो बच्चे अभी इंटर कॉलेज में अध्ययनरत हैं. सतरंगी सपने ——————- सतरंगी सपने देखे जो हमने, बड़े खूबसूरत सपने देखे हमने। पहले तो देखा बन्द आंखों से, […]









