आज यूँ ही मन उदास है
हालांकि सारे अपने भी पास हैं
रात थोड़ा और गहराई
हर तरफ खामोशी सी छाई
नींद ने फिर हमसे किनारा कर लिया
आँख बंद कर ख्याल तुम्हारा कर लिया
साँसों की लय थोड़ा धीमी है
मुस्कान भी आज कुछ भीनी है
आखों का दर्द छलक के बह गया
फिर भी एक टुकड़ा अंदर रह गया
बेचैन मन बस भटक रहा है
जाने क्या है जो इसको खटक रहा है
इस दर्द से अब निजात मिल जाए
ये रात कटे और धूप खिल जाए
धूप में डर थोड़ा कम लगता है
औरों से छोटा अपना ग़म लगता है
डर है ये रात कल फिर से आयेगी
यही कहानी एक बार फिर दोहराएगी.
संध्या सिंह

