साहित्य

कविता : मुक्तिमार्ग (आशीष दीक्षित)

मुक्तिमार्ग

जीवन के कर्णधार
माना कि तुम हो निर्विकार,
और ये भी कि तुम हो निराकार

परन्तु मेरे तीक्ष्ण समर्पण का भाव,
और इसमें मिश्रित आनुपातिक विकार
कर ही लेगा तुमको साकार
ताकि तुम्हारे उज्ज्वल प्राकट्य को
जी-भर देख सके यह संसार
जो कहता फिरता है चहुंओर अभी
कि अभिकल्पना तुम्हारी है केवल असार !

ओ निर्विकल्प शास्ता
मेरे मन का अवशेष विकार
तुम्हारे प्राकट्य का ही माध्यम है
तुम्हारे मार्ग में समर्पित अब ये तन-मन और जीवन है।

• आशीष दीक्षित

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