साहित्य

कविता : औरत… (राजदा खातून)

महिला दिवस की शुभकामनाएं…

औरत…

रत वह है जो खुद तो दर्द सहती है,
लेकिन दूसरों को अपनी खुशी ही बताती है।

औरत वह समुद्र है,
जिसके प्यार को कोई पूरी तरह समझ न सका।

वह दर्द सहती है, मार भी खाती है, ताने भी सहती है,
लेकिन फिर भी खड़ी रहती है,
अपने परिवार के लिए।
वह कोई कदम इसलिए नहीं उठाती,
कहीं उसका परिवार बिखर न जाए।
वह आज भी मानो सती प्रथा की आग में झुलस रही है।

हर जुल्म और सितम सह लेती है,
फिर भी मुस्कुराती रहती है।

वह औरत है, कहां हार मानती है।

खुद तो जीना छोड़ देती है,
जीती है वह अपने परिवार के लिए,
लेकिन फिर भी कमी तुम में ही है।

वह दोहरा काम करती है,
फिर भी एक-एक पैसे के लिए मोहताज रहती है।
क्या यही है औरतों का मुकाम ?

  • राजदा खातून

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