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क्रियात्मक सोच को बढ़ावा देती है नूतन शिक्षा नीति : डॉ. मिलन

भारतीय भाषाओं का संवर्धन जरूरी : कुलपति

संस्कृत विश्वविद्यालय में संगोष्ठी आयोजित

दरभंगा। संस्कृत सप्ताह के पांचवे दिन संस्कृत विश्वविद्यालय में संगोष्ठी आयोजित की गई जिसमें आगत अतिथियों ने खुलकर अपने विचार रखे।
मुख्य अतिथि श्यामा मंदिर न्यास समिति के उपाध्यक्ष एवं संस्कृत के मर्मज्ञ प्रो0 जयशंकर झा ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए इसमें संस्कृत भाषा को उच्चतम स्थान प्रदान किया। उन्होंने संस्कृत की महत्ता का पुरजोर समर्थन किया और इसके विकास के लिए अपने आप को समर्पित बताया। वहीं, राष्ट्रीय शिक्षा नीति और संस्कृत विषय पर बोलते हुए विशिष्ट अतिथि मिथिला विश्वविद्यालय के शिक्षा शास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉ अरविंद कुमार मिलन ने कहा कि नई शिक्षा नीति 2020 में पढाने लिखाने के मामले में भाषाई फ्रीडम टू ईच को तरजीह दी गयी है।।इसमें व्यवहारिक पक्ष को ज्यादा तबज्जो मिला है। यानी कुछ कर ही ज्ञान सीखने पर बल दिया गया है। क्रियात्मक सोच को बढ़ावा मिला है।
छात्रों की रुचि के अनुसार अध्ययन पर बल दिया गया है। हाँ, जब भी भारतीय ज्ञान परम्परा की बात होगी तो संस्कृत का स्थान सर्वोपरि होगा।त्रिभाषा सूत्र के अनुच्छेद 08 में संस्कृत का उल्लेख कर पठन पाठन पर बल दिया है। इसलिए संस्कृत को शिक्षण का माध्यम बनाया जा सकता है।भारतीय भाषा संवर्धन समिति द्वारा इस दिशा में काम किया जा रहा है। इतना ही नहीं, इस नीति में बहुविषयक इन्सिट्युट के बढ़ावे पर भी जोर दिया गया है।
समावेशी शिक्षा पर बल देते हुए पाठ्यचर्या का बोझ कम करने तथा रचनात्मक मूल्यांकन पर जोर दिया गया है। वहीं संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो0 लक्ष्मी निवास पांडेय ने त्रिभाषा सूत्र के स्वरूप को विस्तार से परिभाषित किया। उन्होंने भारतीय भाषा के संवर्धन को जरूरी बताया। कहा कि द्रविड़ आदि भाषाओं में संस्कृत की प्राचूरता मिलती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्पष्ट रूप से वर्णन है कि संस्कृत अथवा भारतीय ज्ञान परम्परा का अध्ययन न केवल संस्कृत के छात्र अपितु आधुनिक विषयों के छात्र भी सहजता से अध्ययन कर सकता है। उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ निशिकांत ने बताया कि डॉ वरुण झा के संचालन में हुई संगोष्ठी को सारस्वत अतिथि शिक्षा शास्त्र विभाग के निदेशक डॉ घनश्याम मिश्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति और संस्कृत के स्वरूप एवं भाषायिक महत्व पर बल दिया। वहीं सहायक प्रध्यापिका डा.साधना शर्मा ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर उनके विभिन्न पक्षों का उपस्थापित किया और संस्कृत को सशक्त माध्यम बताया। महाविद्यालयों के प्रतिनिधि के रूप में सहायक प्राचार्य डॉ.रामसेवक झा ने कहा कि नीप-2020 में संस्कृत को अनिवार्य शब्द से परिभाषित नहीं किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय नागरिक का निर्माण किस प्रकार होना चाहिए इस पर बल दिया गया है। संगोष्ठी में स्वागत भाषण प्रो0 दिलीप कुमार झा ने दिया जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ रितेश चतुर्वेदी ने किया। मौके पर सभी पदाधिकारी व कर्मी के साथ छात्र भी उपस्थित थे।

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