सिख धर्म मानवता की मिसाल, जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों मानव सेवा में अपना सर्वस्व न्योछावर करने को रहते हैं तत्पर- प्रो. सेराज
इतिहास का अध्ययन हमें अपनी जड़ों से जोड़कर समकालीन समस्याओं को समझने हेतु प्रदान करता है व्यापक दृष्टि- अनिल चौधरी

दरभंगा : ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग द्वारा मध्यकालीन भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण आयामों पर एक विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार चौधरी की अध्यक्षता में किया गया। इस संगोष्ठी में विशेष रूप से मुगल-सिख संबंध, धार्मिक-सामाजिक परिवर्तन तथा ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के विश्लेषण पर गंभीर विमर्श के लिए मुख्य वक्ता के रूप में सरकारी डिग्री कॉलेज, तलवारी-थराली, चमोली, उत्तराखंड के प्रधानाचार्य प्रो सेराज मोहम्मद को आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम का शुभारंभ संगोष्ठी-संयोजक डॉ मनीष कुमार द्वारा अतिथियों के स्वागत संबोधन के साथ हुआ। उन्होंने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इतिहास के अध्ययन के माध्यम से समाज में उन्नति, जागरूकता एवं विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण का विकास होता है।

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. सेराज मोहम्मद ने अपने व्याख्यान में मध्यकालीन भारत की जटिल ऐतिहासिक परिस्थितियों को विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने मुगल-सिख संबंधों के विभिन्न चरणों का विश्लेषण करते हुए बताया कि प्रारंभिक दौर में संबंध अपेक्षाकृत संतुलित थे, किन्तु समय के साथ राजनीतिक एवं धार्मिक कारणों से तनाव उत्पन्न हुआ।
उन्होंने बाबर से लेकर औरंगजेब तक की मुगल-सिख संबंध को कई चरणों में विभाजित करके एक रचनात्मक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने गुरु अर्जुन देव के समय की घटनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि मुगल शासन के साथ मतभेद बढ़े, जिसके परिणामस्वरूप सिख-परंपरा में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। इसके बाद गुरु हरगोविंद के काल में सैन्य संगठन शक्ति के पर बल दिया गया, जिससे सिख समुदाय ने आत्मरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया। प्रो मोहम्मद ने आगे गुरु गोविंद सिंह के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना कर सिखों को एक सशक्त एवं संगठित पहचान प्रदान की। गुरु गोविंद सिंह का जन्म 1666 ई. में पटना साहिब में हुआ था और उन्होंने सिख इतिहास को नई दिशा दी।
अपने व्याख्यान में उन्होंने औरंगज़ेब के शासनकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि इस काल में मुगल-सिख संबंधों में अधिक तनाव देखने को मिला। 17 वीं शताब्दी के दौरान अनेक संघर्ष हुए, जिन्होंने दोनों पक्षों के संबंधों को प्रभावित किया। उन्होंने यह भी बताया कि मुगल काल में प्रशासनिक व्यवस्था, विशेषकर ‘राजस्व संग्रह (Tax Collection)’ की प्रणाली ने भी सामाजिक-राजनीतिक ढांचे को प्रभावित किया। साथ ही अकबर के समय धार्मिक सहिष्णुता एवं समन्वय की नीति का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि उस दौर में विभिन्न धर्मों के बीच संवाद एवं संतुलन की स्थिति बनी रही।
प्रो. सेराज मोहम्मद ने अपने व्याख्यान में यह भी स्पष्ट किया कि इतिहास को केवल संघर्ष के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि समन्वय और सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में भी समझना आवश्यक है। इतिहास हमें यह सिखाता है कि समाज निरंतर परिवर्तनशील है और विभिन्न शक्तियों के परस्पर प्रभाव से ही उसका विकास होता है। धर्मगुरुओं की हत्या का एक नकारात्मक प्रभाव को वर्तमान की घटना से जोड़कर अत्यंत ही रोचक बात कही है। जिस प्रकार जहांगीर द्वारा गुरु अर्जुन की हत्या उसके लिए अभिशाप साबित हुआ, उसी प्रकार ईरान के सुप्रीम लीडर खामनेई की हत्या इजरायल और अमेरिका के लिए एक चुनौती बन गई। इतिहास की अपनी एक विशेषता होती है कि जब तक आप इतिहास से सीखते नहीं, तब तक आपको सबक मिलते रहता है।
प्रो. मोहम्मद ने सिख धर्म की विशेषता को उजागर करते हुए बताया कि दुनिया की एक मात्र धर्म जो इस प्रकार मानवता की मिशाल कायम करती है, जिसमें कोई जातिगत भेदभाव नहीं होता है और महिला-पुरुष दोनों मिलकर मानव सेवा में अपनी सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। यहां तक की आवश्यकता पड़ने पर अपनी जेवरात भी बेच देते है।
प्रो. मोहम्मद ने लंगर व्यवस्था को मानव सेवा में समर्पित अद्वितीय कार्य बताया और शोधार्थी रंजीत के प्रश्न- मानवता की मिशाल सिख धर्म इतना सीमित क्यों? का जवाब देते हुए उसके प्रमुख कारणों को उजागर करते हुए उन्होंने सिख धर्म के सीमित होने के पीछे का सबसे बड़ा कारण गुरु प्रथा का अंत माना।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार चौधरी ने कहा कि इतिहास का अध्ययन हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और समकालीन समस्याओं को समझने की दृष्टि प्रदान करता है। उन्होंने विद्यार्थियों को शोध एवं आलोचनात्मक चिंतन की ओर प्रेरित किया। डॉ चौधरी ने सीखों की एकता को उजागर करते हुए गुरु गोविंद सिंह के प्रसिद्ध कथन-
*”सवा लाख से एक लड़ाऊं, चिड़ियां ते मैं बाज़ उड़ाऊं, तबै गुरु गोबिंद सिंह नाम कहाऊं”* की चर्चा करते हुए उन्होंने छात्रों को उत्प्रेरित किया।
इस अवसर पर विभाग के डॉ अमिताभ कुमार ने अपने वक्तव्य में ऐतिहासिक तथ्यों के विश्लेषण एवं स्रोतों की प्रमाणिकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी ऐतिहासिक निष्कर्ष पर पहुँचने से पूर्व तथ्यों का गहन अध्ययन आवश्यक है। पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो मो नैय्यर आज़म ने अपनी वक्तव्य प्रस्तुत की और प्रो मोहम्मद से अपनी निजी संबंधों की चर्चा की जो बेहद रोचक था। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने धार्मिक आंदोलन, सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक संरचना एवं सांस्कृतिक विकास जैसे विषयों पर भी प्रकाश डाला। विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने भी सक्रिय भागीदारी करते हुए प्रश्नोत्तर सत्र को रोचक एवं ज्ञानवर्धक बनाया।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए डॉ. ज्योति प्रभा ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। संचालन डॉ मनीष कुमार ने किया। इस अवसर पर विभाग के प्राध्यापक डॉ अमीर अली खान, मारवाड़ी कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ शकील अख्तर एवं शोधार्थी- रंजीत कुमार चौधरी, चंदन कुमार, प्रतिमा एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
