बिहार

नैरेटिव का विकल्प खोजे बिना कैसे हो उद्धार

डेस्क :चाणक्य की धरती के मतदाताओं ने आधुनिक राजनीति के कौटिल्यों को भी हैरत में डाल दिया है। एनडीए की जीत की उम्मीद एक्जिट पोल कर तो रहे थे, लेकिन उन्हें भी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी। एनडीए की भारी जीत और तेजस्वी की अगुआई वाले महागठबंधन की करारी हार ने कई राजनीतिक संदेश दिए। समाजवादी गठबंधन के लिए कांग्रेस का साथ पत्थर बांध कर तैरने जैसा हो गया है। जिस भी समाजवादी गठबंधन ने कांग्रेस का हाथ थामा, वह राजनीति के समंदर में डूब गया। इसके पहले उदाहरण बिहार के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के अखिलेश यादव हैं। 2017 के विधानसभा चुनावों में यूपी के लड़के के नारे के साथ राहुल गांधी का साथ लेकर अखिलेश चुनावी वैतरणी पार करने उतरे थे, लेकिन भाजपा की लहर में वे डूब गए। 2022 में भी कांग्रेस उनके लिए पतवार नहीं बन सकी। इस बार तेजस्वी के लिए कांग्रेस सहारा नहीं बन पाई। चुनाव नतीजों कुछ वैसे ही हैं, जैसे हम तो डूबे ही सनम, तुझे भी ले डूबेंगे। विपक्षी गठबंधन को अब सोचना होगा कि कांग्रेस का हाथ वह कब और कितना पकड़े कि उसकी सियासी नैया पार लग सके, डूबे नहीं।

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