बिहार

बिहार में बजा चुनावी बिगुल, किसकी पूरी होगी आस, किसकी टूटेगी उम्मीद

डेस्क :हर बार की तरह बिहार विधानसभा का मौजूदा चुनाव उन सभी लोगों के लिए उम्मीदें लेकर आया है, जो खुद चुनाव मैदान में उतरने जा रहे हैं.. उनके समर्थकों की भी उनकी कामयाबी से आस लगी है। कार्यकर्ताओं का बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिसकी सेहत उस दल की जीत या हार पर निर्भर करती है, जिससे उसकी प्रतिबद्धता जुड़ी होती है। लेकिन सबसे ज्यादा उम्मीद पहली बार खुद चुनावी मैदान में उतरने जा रहे प्रशांत किशोर को है। उम्मीद तो तेजस्वी यादव को भी है। उन्हें लगता है कि इस बार उनके नाम के बाद अतीत में लगे उप विशेषण से मुक्ति मिल जाएगी। उम्मीद उस बीजेपी को भी है, जो अपने सहयोगी की तुलना में संख्या बल में ताकवतर होने के बावजूद छोटे भाई की भूमिका निभाने को मजबूर रही है। आस तेजप्रताप को भी है कि वे लालू-राबड़ी की छाया से दूर होने के बावजूद चुनावी मैदान में कमाल दिखाने में वे सफल रहे हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को भी ऐसी ही उम्मीदें हैं। उसे भावी सरकार में हिस्सेदारी की आस है। लेकिन अन्य दलों की तुलना में उसकी उम्मीद कुछ अलग भी है। उसे लगता है कि अगर इस चुनाव में तेजस्वी की अगुआई वाले उसके गठबंधन ने मोदी-नीतीश की जोड़ी को पटखनी दे दी तो दिल्ली के ताज तक की उसकी यात्रा आसान हो जाएगी।

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