डेस्क: पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) से बड़ी खबर सामने आई है। यहां पर चुनावी प्रक्रिया को लेकर विरोध के बीच कई पोलिंग स्टेशनों पर बहुत ही कम मतदान होने की खबर है। बताया जा रहा है कि जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के बहिष्कार के आह्वान के बीच कुछ बूथों पर कथित तौर पर एक भी वोट नहीं पड़ा है। पोलिंग स्टाफ और सुरक्षाकर्मियों की तैनाती के बावजूद कई मतदान केंद्रों पर मतदाता नजर नहीं आए।
रिपोर्ट के मुताबिक, नौ पोलिंग बूथों में से कम से कम तीन पर शून्य मतदान हुआ। बाग-2, मलोट और बारा बारी समेत कई मतदान केंद्रों पर पोलिंग स्टाफ और सुरक्षा बल मौजूद रहे, लेकिन मतदाताओं की संख्या बेहद कम रही या बिल्कुल नहीं पहुंची। ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के मुताबिक, कुछ मतदान केंद्रों के आसपास की सड़कें भी ज्यादातर खाली दिखाई दीं और मतदाता घर से बाहर ही नहीं निकले।
तो JAAC के बहिष्कार का है असर?
बताया जा रहा है कि यह घटनाक्रम JAAC की ओर से चुनाव बहिष्कार के आह्वान के बीच सामने आया है। खासकर पुंछ और बाग क्षेत्रों में चुनावी व्यवस्था और स्थानीय प्रतिनिधित्व को लेकर विरोध तेज होने की बात कही जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोगों ने चुनावी प्रक्रिया को कथित तौर पर ‘ड्रामा’ और ‘दिखावा’ करार दिया है। उनका कहना है कि राजनीतिक दल स्थानीय समस्याओं और शिकायतों का समाधान करने के बजाय सत्ता और विशेष राजनीतिक लाभ हासिल करने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
काले झंडे लहराते दिखे लोग
खबर है कि कई जगहों पर लोगों को मतदान करने के बजाय काले झंडे लहराते और मतदान केंद्रों के आसपास विरोध प्रदर्शन करते देखा गया। मतदाताओं की गैर-मौजूदगी के कारण कुछ पोलिंग स्टाफ को लंबे समय तक खाली बैठना पड़ा। हालांकि, जिन बूथों पर शून्य मतदान की खबर सामने आई है, वे केवल विशिष्ट मतदान केंद्र हैं। इससे पूरे पीओके में पूर्ण चुनावी बहिष्कार का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। अन्य मतदान केंद्रों पर मतदान होने की भी खबर है और अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत में काफी अंतर रहा।
जेएएसी क्यों कर रहा विरोध प्रदर्शन?
बता दें कि जेएएसी के विरोध के पीछे पीओके की चुनावी व्यवस्था में बदलाव की मांग भी प्रमुख मुद्दा बताई जा रही है। संगठन पाकिस्तान में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थियों के लिए विधानसभा में आरक्षित सीटों का भी विरोध कर रहा है। समर्थकों का तर्क है कि ऐसी व्यवस्था स्थानीय मतदाताओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करती है।
क्या है खुफिया सूत्रों का दावा?
दूसरी ओर भारतीय खुफिया सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि यह बहिष्कार इस्लामाबाद के नियंत्रण को लेकर बढ़ते गुस्से को दर्शाता है। उन्होंने मौजूदा चुनावी ढांचे को स्थानीय प्रतिनिधित्व की बजाय शरणार्थी सीटों को प्राथमिकता देने वाला बताया। सूत्रों का दावा है कि जमीनी रिपोर्ट से मुख्यधारा की पाकिस्तानी राजनीतिक पार्टियों और सेना समर्थित राजनीतिक व्यवस्था से लोगों का अलगाव बढ़ता दिख रहा है। उनके मुताबिक, बार-बार शून्य-वोट वाले पोलिंग स्टेशन, विरोध प्रदर्शन और बहिष्कार की घटनाएं बताती हैं कि आबादी का बड़ा हिस्सा अब इन चुनावों को स्थानीय राजनीतिक इच्छा की असली अभिव्यक्ति नहीं मानता।

