डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी सरकार के एक अहम कानून को ढाल बनाते हुए केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है.
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के 2021 के एक अहम ऑफिस मेमोरेंडम को रद्द कर दिया है. इस मेमोरेंडम में किसी प्रोजेक्ट पर बिना पर्यावरण संबंधी मंजूरी के निर्माण कार्य शुरू हो जाने के बाद उसे स्वतः पर्यावरण मंजूरी मिलने की बात कही गई थी. एक तरह से ऐसे प्रोजेक्ट को खुद ब खुद क्लियरेंस मिल जाता था. अब सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने सरकार के इस आदेश को रद्द कर दिया है और इसके लिए उन्होंने 1986 के पर्यावरण संरक्षण कानून का सहारा लिया है.
दरअसल, इस पूरे मामले को कुछ इस तरह समझा जा सकता है. अगर कोई कंपनी फैक्ट्री बना दे, खदान शुरू कर दे या बड़े निर्माण कार्य शुरू कर दे और बाद में सरकार के पर्यावरण संबंधी मंजूरी ले तो इस स्थिति में क्या किया जा सकता है. मौजूदा सरकार के मेमोरेंडम के अनुसार ऐसे प्रोजेक्ट को स्वतः मंजूरी मिल जाती थी. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने अब इस परिपाटी पर रोक लगा दी है. हालांकि शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर जनहित से जुड़ा असाधारण मामला हो और 1986 के पर्यावरण कानून के तहत वैधानिक नोटिफिकेशन जारी किया जाए तब ही सरकार उसके पर्यावरण संबंधी मंजूरी दे सकेगी.
क्या है पूरा मामला
देश में कई ऐसे उद्योग और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट हैं, जिन्हें शुरू करने से पहले पर्यावरण मंजूरी लेना जरूरी होता है. इसका मकसद यह देखना होता है कि परियोजना का जंगल, पानी, हवा और आसपास रहने वाले लोगों पर क्या असर पड़ेगा. लेकिन कई बार ऐसा हुआ कि कंपनियों ने पहले काम शुरू कर दिया और बाद में सरकार से पर्यावरण मंजूरी मांग ली. इसे ही एक्स पोस्ट फैक्टो एनवायरमेंटल क्लियरेंस (काम शुरू होने के बाद मंजूरी) कहा जाता है.
2021 में सरकार ने क्या किया था?
जुलाई 2021 में पर्यावरण मंत्रालय ने एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी किया. इसमें एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाई गई. इसके तहत जिन परियोजनाओं ने पहले ही पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करते हुए काम शुरू कर दिया था, वे भी बाद में आवेदन देकर पर्यावरण मंजूरी हासिल कर सकती थीं. सरकार का तर्क था कि इससे ऐसे प्रोजेक्ट्स को कानूनी प्रक्रिया के दायरे में लाया जा सकेगा. लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना था कि इससे कंपनियों को गलत संदेश जाएगा. वे पहले नियम तोड़ेंगी और बाद में मंजूरी लेकर बच निकलेंगी.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार के 2021 वाले ऑफिस मेमोरेंडम को रद्द कर दिया. अदालत ने कहा कि सरकार सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश जारी करके ऐसा स्थायी सिस्टम नहीं बना सकती, जिससे हर उल्लंघन करने वाले प्रोजेक्ट को बाद में मंजूरी मिलती रहे. कोर्ट ने साफ कहा कि इससे पर्यावरण कानून का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा. क्योंकि पर्यावरण मंजूरी का मकसद नुकसान होने से पहले उसका आकलन करना है, न कि नुकसान होने के बाद उसे वैध बना देना.
1986 के कानून का जिक्र क्यों हुआ?
यहीं इस फैसले का सबसे अहम हिस्सा है. सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण (संरक्षण) कानून, 1986 का हवाला दिया. यह कानून भोपाल गैस त्रासदी के बाद बनाया गया था. उस वक्त देश में दिवंगत राजीव गांधी की सरकार थी. उनको लोकसभा में प्रचंड बहुमत प्राप्त था. उस वक्त कांग्रेस के पास लोकसभा में 414 सांसद थे.इस कानून का उद्देश्य पर्यावरण की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार देना था. इसी कानून के तहत केंद्र सरकार समय-समय पर पर्यावरण से जुड़े नियम और नोटिफिकेशन जारी करती है. वर्ष 2006 की एनवायर्मेंट इंपैक्ट एसेस्मेंट नोटिफिकेशन भी इसी कानून के तहत जारी हुई थी. इसमें यह तय किया गया कि किन परियोजनाओं के लिए पहले पर्यावरण मंजूरी जरूरी होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार भविष्य में किसी विशेष परिस्थिति में बाद में मंजूरी देने की व्यवस्था बनाना चाहती है तो वह सिर्फ 1986 के कानून के तहत जारी वैधानिक नोटिफिकेशन के जरिए ही ऐसा कर सकती है. केवल ऑफिस मेमोरेंडम जारी करके नहीं.
ऑफिस मेमोरेंडम और स्टैच्यूटरी नोटिफिकेशन में क्या अंतर है?
यही अंतर इस पूरे फैसले की असली वजह बना. ऑफिस मेमोरेंडम एक प्रशासनिक आदेश होता है. इसे कोई मंत्रालय जारी कर सकता है. लेकिन इसकी ताकत कानून जैसी नहीं होती. दूसरी ओर वैधानिक नोटिफिकेशन (Statutory Notification) सीधे किसी कानून के तहत जारी किया जाता है. उसे कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है और उसकी वैधता भी अधिक होती है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार ने 2021 में ऑफिस मेमोरेंडम के जरिए ऐसा काम किया, जो केवल कानून के तहत जारी नोटिफिकेशन से ही किया जा सकता था.
क्या अब बाद में पर्यावरण मंजूरी कभी नहीं मिलेगी?
नहीं, ऐसा नहीं है. यहां सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण बात भी कही. अदालत ने यह नहीं कहा कि हर स्थिति में बाद में मंजूरी देना असंभव है. कोर्ट के मुताबिक अगर कोई असाधारण परिस्थिति हो, व्यापक जनहित जुड़ा हो और सरकार 1986 के कानून के तहत वैधानिक प्रक्रिया अपनाए, तब सीमित दायरे में ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है. यानी अदालत ने पूरी तरह दरवाजा बंद नहीं किया, लेकिन यह भी साफ कर दिया कि इसे सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता.
विभिन्न परियोजनाओं पर असर
सरकार की 2021 वाली व्यवस्था के तहत खदानों, सीमेंट प्लांट, स्टील फैक्टरी, एयरपोर्ट, इंडस्ट्रियल एस्टेट, केमिकल यूनिट, अस्पताल और बड़े बिल्डिंग प्रोजेक्ट समेत 100 से ज्यादा परियोजनाओं को बाद में पर्यावरण मंजूरी मिल चुकी थी. कई अन्य परियोजनाएं भी इस प्रक्रिया में थीं. अब भविष्य में ऐसी परियोजनाओं के लिए 2021 वाला रास्ता उपलब्ध नहीं रहेगा.

