भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रवाह हिन्दी में गतिमान है। हिंदी ही भारत की राष्ट्रीय पहचान है। किंतु इसे अभी तक भारत में एकमेव राजभाषा का गौरव नहीं मिल सका है। राजनीतिक तिकड़म और अंग्रेजी प्रेमी नेताओं ने हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी सहायक राजभाषा का दर्जा दिया हुआ है। इसे समाप्त किए जाने की आवश्यकता है। तभी हिंदी भारत की अकेली राजभाषा बन सकेगी। वर्ष 1963 का संसद द्वारा पारित विधेयक इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा है।
हम हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं, क्योंकि इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने लंबी बहस के बाद अनुच्छेद 343 (1) के तहत हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकार किया था। इसमें लिखा गया कि देवनागरी में लिखी गई हिंदी भारत की राजभाषा होगी। इसी उपलक्ष्य में 1953 में पहली बार वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया। तभी से हम हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाते हैं।
स्वतंत्र भारत में हिंदी को न्याय और यथोचित स्थान देने की कोशिश हुई, किंतु अंग्रेजी प्रेमी नेतृत्व का विदेशी भाषा से मोह नहीं टूटा। उन्होंने 1950 में ये निर्णय ले लिया कि आगामी 15 वर्ष तक हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी सहायक राजभाषा रहेगी। ये 15 वर्ष अंतहीन हो गए हैं और आज तक समाप्त नहीं हुए हैं। परिणाम ये हुआ कि हिंदी की समानांतर राज भाषा बनकर अंग्रेजी ने भारत की राजव्यवस्था से लेकर समस्त शिक्षा व्यवस्था को अपने चंगुल में जकड़ लिया। जब अंग्रेजी के लिए निर्धारित समय सीमा निकट आई तो एक बार फिर हिंदी के साथ छल हुआ। वर्ष 1963 में संसद में विधेयक पारित किया गया कि हिंदी के साथ तब तक अंग्रेजी भी राजभाषा बनी रहेगी, जब तक दक्षिण भारत के राज्य हिंदी को राजभाषा मानने पर सहमत न हो जाएं। ये विधेयक ऐसा बैरियर है जो हिंदी को उसके यथोचित सम्मान की दिशा में प्रगति को बाधित करता है।
उत्तर भारत खासकर उत्तर प्रदेश में हिंदी को राजभाषा से आगे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रश्न स्वाभिमान से जुड़ा रहा है। इसी कड़ी में 1910 में राजऋषि पुरुषोत्तम दास टंडन ने हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की। इसमें अनेक हिंदी प्रेमियों ने हिंदी की शाश्वत ज्वाला को प्रज्वलित किया हुआ है। हिंदी को राजभाषा का आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए भी राजऋषि पुरुषोत्तम दास टंडन ने संविधान सभा में लंबी और निर्णायक पैरवी की। प्रखर समाजवादी नेता और चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाया। डॉ. लोहिया का कहना था कि लोकभाषा के बगैर लोकराज असंभव है। पंडित मदनमोहन मालवीय ने 1900 में संयुक्त प्रांत में हिंदी को शासकीय और न्यायालय की भाषा का दर्जा दिलाया। इन प्रयासों से आज हिंदी गौरवान्वित है।
देवनागरी के शासकीय प्रयोग की शताब्दी पर लखनऊ के रवींद्रालय में 18 अप्रैल 2000 को आयोजित समारोह में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल पंडित विष्णुकांत शास्त्री ने कहा था कि आज अखिल भारतीय स्तर पर अंग्रेजी जीत रही है। भारतीय बाधाएं पिछड़ रही हैं। अंग्रेजी प्रतिष्ठा की प्रतीक बन गई है। उन्होंने कहा कि कोई भी स्वाभिमानी देश अपने देश के बच्चों को विदेशी भाषा में शिक्षा नहीं देता। उन्होंने सुझाव दिया कि हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाई जानी चाहिए और हिंदी का प्रयोग नहीं करने पर दंड की व्यवस्था होनी चाहिए।
हिंदी के विकास को कैसे अवरुद्ध किया गया इस पर प्रख्यात साहित्यकार डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने एक लेख में अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने रायबरेली में 30 सितंबर से 1 अक्टूबर 2000 तक आयोजित उप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन के अवसर पर एक लेख प्रेषित किया, जिसे आयोजकों ने पत्रक के रूप में प्रकाशित कर वितरित किया। इसमें डॉ. मिश्रा ने कहा कि अंग्रेजी को 15 वर्ष से आगे बनाए रखने के लिए हिंदी शब्दावली आयोग बना दिए गए। कहा गया हिंदी को तो अभी बनना है। ये आयोग हिंदी के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए नहीं बने, बल्कि मार्ग के रोड़े बने। ये बहाने बने की हिंदी का निर्माण करना है। तत्कालीन एक मंत्री ने कहा था कि हिंदी तो वन की शकुंतला है, इसे राज दरबार में आना है तो इसे राज दरबार के अनुरूप आना होगा।
आज लगभग 77 साल बाद भी राजभाषा का प्रश्न ज्यों का त्यों है। इसे न तो संसद और न ही राजनीतिक दल तय कर सके हैं। हां, समाज और समय ने इसे न्याय देने का प्रयास किया है। समाज ने हिंदी को अपने अंतर्मन में स्थान दिया है, इसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाए रखा है। समय ने भी न्याय किया है। कंप्यूटर युग और इसमें भारतीय भाषा टूल यूनिकोड आदि मील के पत्थर साबित हुए हैं। इस प्रयास में भारत सरकार का योगदान रहा और हिन्दी कंप्यूटर की सुगम भाषा बनकर उभरी है।
वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व से अपेक्षा है कि हिंदी को एकमेव राजभाषा का संविधानिक दर्जा प्रदान करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दें।
सर्वेश कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार, लखनऊ


