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कैबिनेट विस्तार पर ब्रेक: सम्राट सरकार की पहली परीक्षा, अंदरूनी खींचतान बनी बड़ी चुनौती

पटना | बिहार की नई सरकार बनने के बाद अब सबसे ज्यादा नजरें मंत्रिमंडल विस्तार पर टिकी हैं, लेकिन यह प्रक्रिया जितनी आसान दिख रही थी, उतनी है नहीं। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा भेजी गई संभावित मंत्रियों की सूची को केंद्रीय नेतृत्व ने फिलहाल मंजूरी नहीं दी है, जिसके बाद पूरे मामले पर फिर से मंथन शुरू हो गया है। इस घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि सरकार गठन के बाद असली चुनौती अब राजनीतिक संतुलन साधने की है।

दरअसल, मुख्यमंत्री की ओर से तैयार की गई सूची में प्रदर्शन को प्राथमिकता दी गई थी, लेकिन पार्टी नेतृत्व का मानना है कि केवल परफॉर्मेंस के आधार पर कैबिनेट बनाना पर्याप्त नहीं होगा। बिहार की राजनीति में जातीय और क्षेत्रीय समीकरण बेहद अहम भूमिका निभाते हैं, और इन्हें नजरअंदाज करना पार्टी के लिए जोखिम भरा हो सकता है। यही वजह है कि सूची को रोककर नए सिरे से विचार किया जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम में बीजेपी के भीतर चल रही गुटबाजी भी एक बड़ा कारण बनकर सामने आई है। पार्टी के अलग-अलग धड़े अपने-अपने नेताओं और समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। एक ओर नित्यानंद राय का प्रभाव माना जाता है, तो दूसरी ओर डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के अपने-अपने समर्थक हैं। इन सबके बीच सहमति बनाना आसान नहीं हो पा रहा, जिससे विस्तार में देरी हो रही है।

विजय कुमार सिन्हा का मामला इस समय सबसे ज्यादा संवेदनशील माना जा रहा है। हाल के दिनों में उनके कुछ बयानों को लेकर पार्टी के अंदर ही अलग-अलग तरह की व्याख्याएं हो रही हैं। साथ ही, भूमिहार समाज में उनकी मजबूत पकड़ को देखते हुए पार्टी नेतृत्व कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता, जिससे असंतोष बढ़े। ऐसे में उनके लिए उपयुक्त विभाग और भूमिका तय करना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।

इधर, पार्टी इस बार कैबिनेट में नए और युवा चेहरों को शामिल करने पर भी गंभीरता से विचार कर रही है। माना जा रहा है कि सरकार में नई ऊर्जा और संतुलन लाने के लिए कुछ विधायकों को पहली बार मौका मिल सकता है। लेकिन इसके साथ ही पुराने और अनुभवी नेताओं की अनदेखी भी पार्टी के भीतर असंतोष को जन्म दे सकती है।

एक और पेच उन नेताओं को लेकर फंसा है जो हाल के वर्षों में दूसरे दलों से बीजेपी में आए हैं। पार्टी चाहती है कि उन्हें भी उचित प्रतिनिधित्व मिले, ताकि भविष्य में अन्य दलों से आने वाले नेताओं के लिए संदेश सकारात्मक रहे। लेकिन अगर इन्हें ज्यादा प्राथमिकता दी गई तो पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ सकती है।

इन सभी समीकरणों के बीच फिलहाल कैबिनेट विस्तार टलता नजर आ रहा है। केंद्रीय नेतृत्व हर पहलू पर बारीकी से नजर रखते हुए ऐसा संतुलन बनाने की कोशिश में है, जिससे न केवल सरकार मजबूत हो बल्कि संगठन भी एकजुट बना रहे।

स्पष्ट है कि सम्राट चौधरी सरकार के लिए यह पहला बड़ा राजनीतिक इम्तिहान है, जहां हर फैसला सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि सियासी असर भी तय करेगा।

आशुतोष झा

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