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दरभंगा : राष्ट्रीय संगोष्ठी में दो पुस्तकों का हुआ लोकार्पण, संस्कृत विश्वविद्यालय में जुटे कई विद्वान

दरभंगा। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर दर्शन विभाग द्वारा कुलपति प्रो. लक्ष्मीनिवास पांडेय की अध्यक्षता में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं ग्रंथ लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय “भारतीय ज्ञान परंपरा में मूल्य विमर्श” रखा गया था। मौके पर कुलपति प्रो. पांडेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित अनेक विषय अभी भी शोध के क्षेत्र में हैं। इन पर गंभीर अध्ययन की आवश्यकता है। मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. देवनारायण झा विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. सिद्धार्थ शंकर सिंह (प्राचार्य, मिल्लत कॉलेज, दरभंगा), डॉ. सुनील नारायण उपाध्याय (प्रख्यात प्रबंधन शास्त्र विशेषज्ञ, वाराणसी), डॉ. बौआनंद झा (पूर्व विभागाध्यक्ष, दर्शन विभाग) शामिल थे ।
कार्यक्रम का प्रारंभ विश्वविद्यालय के छात्र विश्वमोहन झा और अवधेश द्वारा मंगलाचरण से हुआ। इसके पश्चात कुलगीत का प्रस्तुतीकरण विश्वविद्यालय की शिक्षिकाओं डॉ. माया, डॉ. साधना शर्मा, डॉ. देवहुति कुमारी, डॉ. प्रीति कुमारी तथा छात्राओं नेहा और अंशु द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रीतेश कुमार चतुर्वेदी ने किया।कार्यक्रम के संयोजक डॉ. सुधीर कुमार (साहित्य विभाग) थे, जबकि समन्वयक के रूप में डॉ. शंभु शरण तिवारी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वागत भाषण देते हुए डॉ. धीरज कुमार पांडे ने भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “मूल्य वही है जो मनुष्य में मनुष्यता को स्थापित करता है।”
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव डॉ. विमल नारायण ठाकुर द्वारा रचित दो ग्रंथों का लोकार्पण किया गया जिनमें योगी बच्चा झा तथा उपनिषद् पोएट्री प्रमुख हैं। ग्रंथकार डॉ. ठाकुर ने अपने संबोधन में योगी बच्चा झा के जीवन, उनके विद्वत्व तथा भारतीय ज्ञान परंपरा में उनके योगदान का विस्तृत परिचय दिया। साथ ही उपनिषदों में प्रतिपादित मूल्यों और भगवद्गीता के प्रसंगों के माध्यम से उनके दार्शनिक महत्व को रेखांकित किया।
पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. बौआनंद झा ने अपने उद्बोधन में शिव स्तुति से प्रारंभ करते हुए योगी बच्चा झा के पारिवारिक एवं शैक्षिक जीवन पर प्रकाश डाला तथा उनकी अध्ययन परंपरा का उल्लेख किया।
प्राचार्य डॉ. सिद्धार्थ शंकर सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध है और विभिन्न दर्शन एवं मतों का मूल स्रोत भारत ही है। उन्होंने संस्कृत को एक विशाल वटवृक्ष बताते हुए कहा कि इसके अंतर्गत समस्त ज्ञान परंपराएँ विकसित हुई हैं।
प्रबंधन शास्त्र विशेषज्ञ डॉ. सुनील नारायण उपाध्याय ने अपने वक्तव्य में भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक प्रबंधन के संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज के कई प्रबंधन सिद्धांतों की जड़ें भारतीय परंपरा में निहित हैं। उन्होंने प्राचीन प्रशासनिक संरचना का उदाहरण देते हुए बताया कि छोटे-छोटे इकाइयों से लेकर राजा तक की संगठित व्यवस्था एक सुदृढ़ प्रबंधन प्रणाली का उदाहरण थी, जिसका उल्लेख कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी मिलता है।
मुख्य अतिथि प्रो. देवनारायण झा ने योगी बच्चा झा के जीवन और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि आज की पीढ़ी को अपनी ज्ञान परंपरा से परिचित होने की आवश्यकता है। उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि योगी बच्चा झा की रचनाओं में निहित गूढ़ वैज्ञानिक तत्वों ने आधुनिक वैज्ञानिकों को भी प्रभावित किया है।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. शंभु शरण तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर डॉ. गंगेश, डॉ. मुकेश (सचिव, प्रभात फाउंडेशन), प्रो. दयाना झा, प्रो. दिलीप झा सहित अनेक विद्वानों एवं शोधार्थियों की सहभागिता रही। कार्यक्रम के सफल आयोजन में अजय का विशेष सहयोग रहा।

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