डेस्क :छत्रपति संभाजीनगर के गंगापुर में आयोजित ‘हिंदू सम्मेलन’ और ‘युवा सम्मेलन’ को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत के भविष्य और हिंदुओं की वैश्विक जिम्मेदारी पर एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की पहचान केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक विशिष्ट ‘चरित्र’ है, जिसकी धुरी हिंदू समाज है। भागवत ने कहा कि हिंदू समाज पारंपरिक रूप से समावेशी और सभी को स्वीकार करने वाला रहा है जो रीति-रिवाजों, पहनावे, खान-पान, भाषा, जाति और उपजाति में विविधता को अपनाता है और इन मतभेदों को संघर्ष का कारण नहीं बनने देता।
