डेस्क :बिहार विधानसभा चुनाव एक बार फिर उस पुराने ढर्रे पर लौट आए हैं, जहाँ मुद्दे नहीं, मतों का गणित और भावनाओं का ज्वार तय करता है कि सत्ता किसके हाथ जाएगी। सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों, बेरोज़गारी, कृषि संकट या पलायन जैसे असली सवाल कहीं खो गए हैं। उनकी जगह ले ली है जातीय समीकरणों, धार्मिक ध्रुवीकरण और नेताओं की आपसी झड़पों ने।आज जब बिहार को विकास की सबसे अधिक आवश्यकता है, राजनीतिक दल उसी राजनीति को दोहरा रहे हैं जिसने राज्य को दशकों पीछे धकेला। हर पार्टी अपने-अपने “वोट बैंक” को साधने में लगी है। कोई पिछड़ों की बात कर रहा है, तो कोई अल्पसंख्यकों की, तो कोई युवाओं को सिर्फ नारों के सहारे बहला रहा है। न कोई ठोस दृष्टि प्रस्तुत कर रहा है, न ही कोई यह बता पा रहा है कि बिहार को देश के औसत विकास स्तर तक कैसे पहुँचाया जाएगा।
