डेस्क: ठंड का मौसम शुरू होने के साथ ही श्वसन संबंधी संक्रमण चिंता का विषय बन गए हैं। बाल रोग विशेषज्ञों ने माता-पिता से कहा है कि वे सामान्य सर्दी-खांसी और निमोनिया, अस्थमा के बिगड़ने या अन्य ऐसी स्थितियों के बीच फर्क समझें, जिनमें तुरंत मेडिकल मदद की जरूरत हो सकती है। डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों में ऊपरी श्वसन तंत्र के ज्यादातर सामान्य संक्रमण वायरस के कारण होते हैं और सही देखभाल से ठीक हो जाते हैं। लेकिन, अगर बच्चा तेजी से या मुश्किल से सांस ले रहा हो, सांस लेते समय उसकी छाती अंदर धंस रही हो, वह ठीक से खाना-पीना न कर रहा हो या बहुत ज्यादा सुस्त लग रहा हो, तो इसे सिर्फ मौसमी बीमारी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
बच्चे के इन लक्षणों पर रखें नजर
डॉक्टरों ने बताया कि बच्चों में वायरल श्वसन संक्रमण होने पर नाक बहना, हल्का बुखार, गले में खराश और खांसी होना आम बात है। उन्होंने कहा कि सिर्फ इस बात से यह तय नहीं किया जा सकता कि संक्रमण कितना गंभीर है कि लक्षण कितने समय तक रहे। बच्चे की सांस लेने की प्रक्रिया, उसकी गतिविधियां, शरीर में पानी की मात्रा और उसकी कुल मिलाकर स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। डॉक्टर ने कहा- “माता-पिता को सिर्फ बुखार या खांसी की तीव्रता देखकर बीमारी की गंभीरता का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए, बल्कि बच्चे की पूरी स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। वायरल संक्रमण वाले बच्चे की नाक बह सकती है, उसे हल्का बुखार और खांसी हो सकती है, लेकिन वह फिर भी एक्टिव रह सकता है, तरल पदार्थ ले सकता है और आराम से सांस ले सकता है। चिंता तब होनी चाहिए जब बच्चे के सांस लेने के तरीके या व्यवहार में कोई बदलाव दिखे।”
ये लक्षण दिखते ही तुरंत पहुंचे डॉक्टर के पास
अगर बच्चा तेजी से सांस ले रहा हो, पसलियों के बीच या नीचे की त्वचा अंदर की ओर खिंच रही हो, सांस लेते समय नथुने फूल रहे हों, या सांस फूलने की वजह से उसे बोलने, रोने या कुछ खाने-पीने में दिक्कत हो रही हो, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। डॉक्टर ने कहा- “माता-पिता को इस बात पर भी नजर रखनी चाहिए कि बच्चा बहुत ज्यादा सुस्त तो नहीं है, कुछ पीने-खाने से मना तो नहीं कर रहा, या उसे पेशाब कम तो नहीं आ रहा है। जिन बच्चों को पहले से ही दिल या फेफड़ों से जुड़ी कोई समस्या है, उन पर खास ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि उनकी तबीयत बहुत तेजी से बिगड़ सकती है। अगर बच्चे को सांस लेने में दिक्कत हो रही है या वह बहुत ज्यादा बीमार लग रहा है, तो माता-पिता को बुखार बढ़ने या घरेलू नुस्खों के असर करने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि तुरंत मेडिकल मदद लेनी चाहिए।”
इन बच्चों को देखभाल की ज्यादा जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि श्वसन संबंधी वायरस अस्थमा से पीड़ित बच्चों में घरघराहट (wheezing) और सांस लेने में कठिनाई पैदा कर सकते हैं। अगर बच्चे को बार-बार खांसी होती है – खासकर रात के समय या शारीरिक गतिविधि के दौरान – तो यह अस्थमा या सांस की नली से जुड़ी किसी अन्य समस्या का संकेत हो सकता है, जिसकी जांच करानी चाहिए। जिन बच्चों को पहले से ही अस्थमा का निदान हो चुका है, उनके माता-पिता को अपने डॉक्टर द्वारा निर्धारित उपचार योजना का पालन करना चाहिए और यह जानना चाहिए कि कब अनुशंसित राहत दवा का उपयोग करना है और कब आपातकालीन देखभाल की आवश्यकता है।अगर बच्चे को सांस लेने में तकलीफ हो रही है, वह आराम से बोल या पी नहीं पा रहा है, या निर्धारित बचाव उपचार से उसकी हालत में सुधार नहीं हो रहा है, तो तत्काल चिकित्सा सहायता आवश्यक है।
एंटीबायोटिक दवाओं की कब पड़ती है जरूरत?
अधिकांश सामान्य वायरल श्वसन संक्रमणों में एंटीबायोटिक दवाओं की आवश्यकता नहीं होती है। डॉक्टर ने समझाया- ये दवाएं बैक्टीरिया के खिलाफ काम करती हैं, वायरस के खिलाफ नहीं और इनका अनावश्यक उपयोग रोगाणुरोधी प्रतिरोध को बढ़ावा देता है। हालांकि, उन्होंने कहा कि जब डॉक्टर निमोनिया जैसे जीवाणु संक्रमण का निदान करते हैं या इसकी प्रबल आशंका होती है, तो उचित एंटीबायोटिक्स आवश्यक हो सकती हैं। डॉक्टरों के अनुसार माता-पिता को हर खांसी को हानिरहित नहीं समझना चाहिए या एंटीबायोटिक्स से बचने के लिए डॉक्टर से परामर्श में देरी नहीं करनी चाहिए। जब निमोनिया या किसी अन्य जीवाणु संक्रमण की आशंका हो, तो समय पर जांच और उपचार महत्वपूर्ण है।
इन बातों का रखें ख्याल
बची हुई एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल न करें, किसी दूसरे बच्चे के लिए लिखी गई दवाइयां साझा न करें या डॉक्टर से सलाह लिए बिना दवा का कोर्स बीच में न छोड़ें। खांसी और जुकाम की दवाएं अंधाधुंध न दें, खासकर छोटे बच्चों को। सहायक देखभाल, तरल पदार्थ, आराम और निगरानी से कई बच्चों को ठीक होने में मदद मिल सकती है, लेकिन सांस लेने में तकलीफ बढ़ना, ठीक से खाना न खाना या सतर्कता में कमी आना जैसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना आवश्यक है। निमोनिया फेफड़ों को प्रभावित करता है और इससे बुखार, खांसी तथा सांस लेने में तेजी या कठिनाई हो सकती है। छाती का अंदर की ओर धंसना, सांस लेते समय घरघराहट या अजीब आवाज आना, होंठों का नीला पड़ना, कुछ भी पीने या स्तनपान करने में असमर्थता, और बच्चे का सुस्त पड़ जाना (सतर्कता में कमी)।


