डेस्क : विश्वकर्मा पूजा के दिन सिर्फ भगवान विश्वकर्मा की पूजा ही नहीं की जाती, बल्कि काम में इस्तेमाल होने वाली मशीनों, औजारों, वाहनों और उपकरणों की भी पूजा करने की परंपरा है। खास बात यह है कि कई कारखानों, दुकानों और कार्यस्थलों पर मशीनों की पूजा से पहले उन पर रोली या कुमकुम से स्वस्तिक, ‘ॐ’ और ‘शुभ-लाभ’ जैसे शुभ चिह्न बनाए जाते हैं। आखिर इन प्रतीकों को मशीनों पर बनाने की परंपरा क्यों है और इनका क्या अर्थ माना जाता है? आइए जानते हैं।
मशीनों पर स्वस्तिक बनाने की परंपरा
हिंदू धर्म में स्वस्तिक को शुभता और मंगल का प्रतीक माना जाता है। ‘स्वस्तिक’ शब्द को सामान्य तौर पर ‘सु’ और ‘अस्ति’ से जोड़कर देखा जाता है, जिसका भावार्थ कल्याण और शुभता से जुड़ा है। यही वजह है कि पूजा-पाठ और दूसरे मांगलिक कार्यों में स्वस्तिक बनाया जाता है। विश्वकर्मा पूजा पर मशीनों और औजारों पर भी रोली, कुमकुम या सिंदूर से स्वस्तिक बनाने की परंपरा कई जगह देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसे काम में शुभता और बाधाओं से मुक्ति की कामना के प्रतीक के तौर पर बनाया जाता है।
गणेश जी से भी जुड़ा है स्वस्तिक
स्वस्तिक को कुछ धार्मिक परंपराओं में भगवान गणेश से भी जोड़ा जाता है। गणेश जी को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना जाता है। इसलिए विश्वकर्मा पूजा के दौरान मशीन पर स्वस्तिक बनाते समय कई लोग काम में आने वाली रुकावटों को दूर करने और कार्य सुचारु रूप से चलने की प्रार्थना करते हैं। हालांकि, मशीन पर स्वस्तिक बनाने से तकनीकी खराबी या दुर्घटना निश्चित रूप से नहीं होगी, ऐसा वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह मुख्य रूप से धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ी प्रथा है।
कारोबार में ‘शुभ-लाभ’ लिखने की मान्यता
विश्वकर्मा पूजा के दौरान कई दुकानों, फैक्ट्रियों और कार्यस्थलों पर ‘शुभ-लाभ’ भी लिखा जाता है। ‘शुभ’ का संबंध मंगल और अच्छे कार्य से, जबकि ‘लाभ’ का संबंध आर्थिक उन्नति और कारोबार में बरकत से जोड़ा जाता है। इसी मान्यता के चलते मशीनों, मुख्य द्वार या पूजा स्थल पर ‘शुभ-लाभ’ लिखकर लोग भगवान विश्वकर्मा से अपने काम में तरक्की और समृद्धि की कामना करते हैं।
‘ॐ’ हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रतीक है। इसे पवित्र ध्वनि और ईश्वर से जुड़े आध्यात्मिक भाव का प्रतीक माना जाता है। विश्वकर्मा पूजा के दौरान मशीनों या औजारों पर ‘ॐ’ लिखने की परंपरा भी इसी धार्मिक आस्था से जुड़ी है। मान्यता है कि किसी शुभ कार्य की शुरुआत ‘ॐ’ के स्मरण से करने से मन में सकारात्मक भाव और आध्यात्मिक एकाग्रता आती है।
मशीनों पर कलावा बांधने की परंपरा
कई जगह विश्वकर्मा पूजा के बाद मशीनों के हैंडल, औजारों या दूसरे उपकरणों पर कलावा या मौली भी बांधी जाती है। इसे धार्मिक रूप से रक्षा सूत्र माना जाता है। कुछ लोगों की मान्यता है कि मशीन पर मौली बांधना उसकी रक्षा और पूरे साल काम में शुभता की कामना का प्रतीक है। इसी तरह कई जगह पूजा के दौरान वाहनों और दूसरे उपकरणों पर भी रक्षा सूत्र बांधा जाता है।
मशीनों को फूल-माला और तिलक से सजाते हैं
विश्वकर्मा पूजा के दिन मशीनों और औजारों को पहले अच्छी तरह साफ किया जाता है। इसके बाद उन पर हल्दी, रोली, कुमकुम या चंदन से तिलक लगाया जाता है और फूल-माला चढ़ाई जाती है। कई कार्यस्थलों पर मशीनों को फूलों से सजाने के साथ उनके सामने दीपक जलाकर पूजा की जाती है। इसका उद्देश्य काम में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों के प्रति सम्मान और भगवान विश्वकर्मा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना माना जाता है।
विश्वकर्मा पूजा केवल मशीनों की पूजा तक सीमित नहीं है। यह उन औजारों और तकनीक के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी है, जिनके जरिए लोग रोजी-रोटी कमाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा कर लोग अपने काम में सफलता, सुरक्षा, तरक्की और समृद्धि की कामना करते हैं।


