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”फील्डिंग अच्छी नहीं तो प्लेइंग 11 में जगह नहीं”, सुरेश रैना ने खोला टीम इंडिया की फील्डिंग का बड़ा राज

डेस्क: भारत के पूर्व स्टार क्रिकेटर सुरेश रैना ने अपने करियर के दौरान टीम इंडिया की बेहतरीन फील्डिंग संस्कृति को लेकर बड़ा खुलासा किया है। रैना ने बताया कि कैसे कड़ी मेहनत, अनुशासन और मोहम्मद कैफ जैसे खिलाड़ियों की सोच ने भारतीय टीम को दुनिया की सबसे बेहतरीन फील्डिंग यूनिट में बदलने में अहम भूमिका निभाई।
‘हमने फील्डिंग की एक संस्कृति बनाई थी’
रैना ने बताया कि उस दौर में फील्डिंग सिर्फ औपचारिक अभ्यास नहीं होती थी, बल्कि हर खिलाड़ी इसे गंभीरता से लेता था। ‘हमने फील्डिंग की एक संस्कृति बनाई थी। सभी खिलाड़ी आधा घंटा पहले मैदान पर पहुंचते थे क्योंकि ट्रेनिंग की शुरुआत हमेशा फील्डिंग से होती थी। आज की तरह कुछ कैच पकड़कर अभ्यास खत्म नहीं हो जाता था। हम हाई कैच, ग्राउंड फील्डिंग, स्लिप कैच और पैरेलल कैच की अलग-अलग प्रैक्टिस करते थे। बीच में एक स्टंप लगाया जाता था और यूपी टीम के कप्तान मोहम्मद कैफ हमेशा कहते थे- ‘डायरेक्ट हिट नहीं किया तो प्लेइंग XI में जगह नहीं मिलेगी।’
जोंटी रोड्स, कैफ और युवराज से मिली प्रेरणा
रैना ने कहा कि उनकी फील्डिंग को बेहतर बनाने में कई दिग्गज खिलाड़ियों का बड़ा योगदान रहा। ‘जोंटी रोड्स से तारीफ मिलना हमेशा खास रहा क्योंकि वह हमारे आदर्श थे। उत्तर प्रदेश में मैंने मोहम्मद कैफ से बहुत कुछ सीखा। वहीं भारतीय टीम में युवराज सिंह के साथ खेलते हुए हमने पॉइंट, कवर और मिड-ऑफ पर कई बार ऐसा फील्डिंग सर्कल बनाया कि गेंद हमारे बीच से निकल ही नहीं पाती थी।’
इरफान पठान के साथ टक्कर आज भी याद
रैना ने ऑस्ट्रेलिया दौरे का एक दर्दनाक किस्सा भी साझा किया, जब एक कैच लेते समय उनकी इरफान पठान से जोरदार टक्कर हो गई थी। ‘सिडनी में एक मैच के दौरान रवींद्र जडेजा गेंदबाजी कर रहे थे। डेविड वॉर्नर ने स्वीप खेला और गेंद हवा में चली गई। मैं मिडविकेट से दौड़ा और इरफान भाई फाइन लेग से आ रहे थे। मेरी नजर सिर्फ गेंद पर थी। कैच पकड़ते ही मेरी उनसे टक्कर हो गई। एक पल के लिए लगा कि अगर सिर टकरा जाता तो बड़ा हादसा हो सकता था। सौभाग्य से सिर्फ कंधा टकराया और कैच भी नहीं छूटा, लेकिन इरफान भाई की पसली में फ्रैक्चर हो गया। उसी दिन हमने सीखा कि जिसका कैच हो, वही जोर से कॉल करे।’
फील्डिंग ने बनाई अलग पहचान
रैना ने कहा कि लगातार अभ्यास, सही संवाद और टीम के भीतर बने अनुशासन ने उनकी फील्डिंग को नई पहचान दी। यही वजह रही कि वह लंबे समय तक भारतीय टीम के सबसे भरोसेमंद फील्डरों में गिने गए और उनकी फुर्ती व कमिटमेंट आज भी मिसाल मानी जाती है।

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