दरभंगा

केएसडीएसयू के पूर्वकुलपति के निधन से शिक्षा जगत को अपूर्णीय क्षति दरबार हाल में शोक सभा आयोजित दरभंगा

दरभंगा:केएसडीएसयू के पूर्व प्रभारी कुलपति डॉ विश्वनाथ झा का मंगलवार को पैतृक गांव दीप, मधुबनी में निधन हो गया। वे पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके चले जाने से संस्कृत साहित्य, मिथिलांचल एवं समूचे शिक्षा जगत को अपूरणीय क्षति पहुँची है। 19 फरवरी से 15 मार्च 2008 तक वे संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति बनाये गए थे। इनके अल्पकाल में लिए गए निर्णयों को लोग आज भी याद करते हैं। उनके निधन पर बुधवार को दरबार हाल में कुलपति प्रो० लक्ष्मी निवास पाण्डेय की अध्यक्षता में शोक सभा का आयोजन किया गया।
उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ डॉ निशिकांत ने बताया कि प्रो० दिलीप कुमार झा ने उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला जबकि शोक प्रस्ताव कुलसचिव डा. दिनेश झा ने पढा। शोक सभा में विश्वविद्यालय के सभी पदाधिकारीगण प्रो० पुरेन्द्र वारिक, डा. पवन कुमार झा, डा. नवीन कुमार झा, डा. कुणाल कुमार झा, डा. सीताचरण झा, डा. धीरज कुमार पाण्डेय, डा. ध्रुव मिश्र, डा. रामनिहोरा राय, डा. संतोष पासवान, डा. नरोत्तम मिश्र, डा. रामसेवक झा, डा.छबिलाल न्यौपाने, डा. रविन्द्र मिश्र, गोपाल उपाध्याय, सुशील कुमार झा, अभिमन्यु कुमार समेत अन्य सभी कर्मी मौजूद थे।

डॉ झा का जीवन वृत्त

पीआरओ डॉ निशिकांत ने बताया कि डॉ. विश्वनाथ झा साहित्य जगत के मूर्धन्य विद्वान्, प्रखर शिक्षाविद्, प्रख्यात शास्त्रचूड़ामणि एवं कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व प्रभारी कुलपति थे। आचार्य, एम.ए. (संस्कृत) एवं विद्यावारिधि (पीएच.डी.) की उच्च उपाधियों से विभूषित संपूर्ण जीवन शिक्षण, कुशल प्रशासन एवं अनवरत साहित्य-साधना को समर्पित रहे।
विभिन्न प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए व्याख्याता, उपाचार्य, प्रधानाचार्य, विश्वविद्यालय प्राचार्य सह प्रभारी प्रधानाचार्य, स्नातकोत्तर साहित्य विभागाध्यक्ष से प्रभारी कुलपति तक पहुंचे। वे संस्कृत विश्वविद्यालय के अभिषद् (सिंडिकेट) एवं अधिषद् (सीनेट)के भी सदस्य रह चुके थे। वे उत्कृष्ट कोटि के रचनाकार और समीक्षक भी थे। साहित्यशास्त्र और मैथिली भाषा को समृद्ध करने में उनका अतुलनीय योगदान रहा है। उनके द्वारा रचित एवं संपादित प्रमुख कई कृतियाँ हैं जो हमें सदैव मार्ग प्रशस्त करती रहेंगी। इसमें नैषधीयचरित का दार्शनिक अध्ययन (शोधविषयक), शंखचूड़वध नाटक (मैथिली), म.म. चित्रधर विरचित शृंगारसारिणी का हिंदी अनुवाद,पं. जीवनाथ झा कृत दोषाकर (काव्यदोष) का संपादन, षोडशसंस्कारनिरूपणम् (सारस्वत पत्रिका), साहित्यशास्त्रे व्यंजनावृत्तिर्गरीयसी, चन्द्रालोक – मैथिली अनुवाद, हनुमन्नाटक – मैथिली अनुवाद प्रमुख है। वर्ष 2009 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे निरंतर अपने अगाध ज्ञान और अनुभव से विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों का मार्गदर्शन करते रहे।
साहित्यशास्त्र पर उनकी अद्वितीय पकड़, सरलता और कुशल प्रशासनिक क्षमता सदैव स्मरणीय रहेगी।

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