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15 साल बाद सत्ता से कैसे हुई ममता बनर्जी की विदाई? ये 5 फैक्टर बने वजह

डेस्क: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (West Bengal Assembly Elections) के नतीजे सामने आने के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा फेरबदल होता नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी, जिससे साथ ही बंगाल में इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का दिया नारा सच साबित हो रहा है- ‘4 मई और दीदी गई’।
तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी 15 सालों से लगातार पश्चिम बंगाल में मुख्यमत्री रही हैं, लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन की लहर नजर आई है। भारतीय जनता पार्टी की तरफ से बंगाल में चुनाव प्रचार के लिए केंद्रीय मंत्रियों, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और कई बड़े नेताओं को भेजा गया और इस बार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने बहुमत के आंकड़े को पार कर लिया।

ममता बनर्जी की हार के 5 फैक्टर
बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की हार के कई बड़े कारण सामने आ रहे हैं, जिसके चलते ही बंगाल की जनता ने सत्ता परिवर्तन का रास्ता चुना है। आइए उन पांच फैक्टर के बारे में जानते हैं, जिनकी वजह से ममता बनर्जी ने अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवा दी।
आरजी कर रेप केस
कोलकाता के आरजीकर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल से सामने आए दुष्कर्म और हत्या के मामले ने केवल पश्चिम बंगाल को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया था। इस मामले के सामने आने के बाद ही ममता बनर्जी की सरकार पर लॉ एंड ऑर्डर को सवाल उठने लगे।
ममता बनर्जी के खिलाफ मुद्दा था, जिसे जनता ने खुद उठाया था। इस घटना के बाद बीजेपी और कांग्रेस ने भी ममता सरकार को निशाने पर लिया। वहीं विधानसभा चुनाव आने के साथ ही भारतीय जनता पार्टी ने पानीहाटी की सीट से आरजीकर रेप पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को अपना उम्मीदवार बना दिया। बंगाल चुनाव को लेकर वोटों की गिनती अभी भी जारी है। दोपहर 3 बजे तक आए रुझानों में आरजीकर रेप पीड़िता की मां BJP की सीट से 20 हजार वोटों से आगे चल रही हैं। देखा जाए तो आरजीकर रेप केस ने ही ममता की मुख्यमंत्री की कुर्सी का एक पाया गिरा दिया।
I-PAC पर छापा पड़ने से तिलमिला गई थीं ममता
पश्चिम बंगाल में जनवरी में चुनावी माहौल चरम पर था और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम कोलकाता पहुंची। ईडी ने यहां पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC से जुड़े ठिकानों पर छापामारी की। I-PAC के ऑफिस में ईडी के पहुंचने के कुछ देर बाद ही ममता बनर्जी खुद उस दफ्तर में पहुंच गईं, जहां ED छानबीन कर रही थी। ममता दफ्तर में से कुछ फाइलें और एक लैपटॉप लेकर बाहर निकल आईं। बता दें कि 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से ही I-PAC, टीएमसी के साथ काम कर रही है।
ईडी ने कोयला चोरी घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जांच-पड़ताल की। इस फर्म पर आरोप लगा कि घोटाले का धन (I-PAC) तक भी पहुंचा है। ईडी के मुताबिक, इस पैसे का इस्तेमाल गोवा विधानसभा चुनाव में I-PAC ने टीएमसी के प्रचार के लिए किया। ईडी की इस छापामारी का असर ममता बनर्जी की छवि पर पड़ा। बीजेपी ने आरोप लगाया कि ममता खुद को बचाने के लिए एजेंसियों की जांच में दखल रही हैं। इस मामले के सामने आने के साथ ही ममता का नाम भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया।
मुर्शिदाबाद में हिंसा
मुर्शिदाबाद में अप्रैल 2025 में हुई हिंसा ने ममता बनर्जी सरकार की छवि को धूमिल किया। मुर्शिदाबाद के जंगीपुर में वक्फ कानून के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा था, लेकिन ये प्रदर्शन कुछ दिनों में ही हिंसक हो गया।
मुर्शिदाबाद में तोड़फोड़, आगजनी, नेशनल हाईवे और ट्रेन यातायात को रोकने की कोशिश भी की गई, जिसकी वजह से कुछ ट्रेनों की आवाजाही पर असर पड़ा। इस घटना के बाद से विपक्ष ने आरोप लगाने शुरू किए कि ममता अपने राज्य में हिंसा रोकने की जगह उसे बढ़ावा देती हैं। मुर्शिदाबाद में हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि इस घटना को लेकर केंद्र सरकार ने भी दखल दिया था।
केंद्र की योजनाओं से ममता की दूरी
ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति पर 15 सालों तक पकड़ बनाए रखी, लेकिन इस बार के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को बड़े ही जोर-शोर से उठाया कि ममता सरकार केंद्र की योजनाओं को बंगाल तक नहीं आने दे रही।
बीजेपी ने आरोप लगाया कि बीते 12 सालों में ममता ने हर जल योजना, जन-धन योजना समेत कई केंद्रीय योजनाओं को बंगाल में जमीनी स्तर तक नहीं उतरने दिया। बंगाल की जनता ने भी 15 सालों बाद सत्ता परिवर्तन किया है और तृणमूल कांग्रेस की जगह अगले पांच सालों के लिए भारतीय जनता पार्टी का पूर्ण बहुमत के साथ मौका दिया है।
हुमायूं कबीर की बंगाल में बाबरी मस्जिद की मांग
TMC के पूर्व नेता हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद जिले में बाबरी मस्जिद बनाने की मांग रखी थी। हुमायूं का कहना था कि अयोध्या की जगह बंगाल के मुर्शिदाबाद में मस्जिद बनानी चाहिए। इस मुद्दे पर विवाद छिड़ने की वजह से टीएमसी ने हुमायूं कबीर को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। हालांकि हुमायूं कबीर ने इसके बाद आम जनता उन्नयन पार्टी के नाम से अपना दल बनाया। लेकिन बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने की बात हुमायूं कबीर ने टीएमसी में रहते हुए की थी।
चुनाव से पहले हुआ SIR
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पूरे देश में हुआ, लेकिन एसआइआर को लेकर सबसे ज्यादा सियासत बंगाल में हुई। ममता सरकार ने इसे लेकर चुनाव आयोग के साथ-साथ बीजेपी को भी घेरा।
एसआइआर को लेकर ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच तीखी बहस चलती रही। ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा और चुनाव होने से ठीक पहले तक भी कोर्ट में इस मामले को लेकर सुनवाई चलती रही। देखा जाए तो ममता बनर्जी के खिलाफ ‘एंटी इनकंबेंसी’ ने बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की एंट्री करा दी है। बीजेपी ने भी इस चुनाव में घर-घर जाकर लोगों का भरोसा जीता है और अब पहली बार भाजपा, बंगाल में सरकार बनाने के लिए तैयार है।

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