साहित्य

कविता : हे मात… (आशीष दीक्षित)

हे मात
घृती, श्री, विवेक विद्या और वाणी में भी परा वाक्
तुम्हारा है ऐसा ऐश्वर्य कि,
शिशु है इससे विस्मित और अवाक्,
हे माता हो सृजन की अधिष्ठात्री,
कभी बन जाती हो शरद पूर्णिमा और कभी अमावस की घोर रात्रि !
हे मात
शुद्ध व निश्छल बाल प्रेम,
कर लेती हो तुम आत्मसात,
विह्वल बालक पर प्रेम विकल होकर तत्क्षण तुम करती शत्रु घात,
हे मात
ये विवेक, बुद्धि, चेतना अथवा आत्मज्ञान,
सब है तुम्हारा और तुम्हारी करुणा का अनुदान,
नाग किन्नर देव यक्ष राक्षस मानवादि सारे,
श्वास लेते हैं प्राण रूप जिस अंश मात्र कुंडलिनी के सहारे,
तुम एक मात्र हो संचालिका उसकी,
तुम एकमात्र हो प्रचालिका उसकी,
हे मात
क्षमा हेतु करबद्ध होकर अकिंचन,
सहस्रों बार करते हैं प्रणाम नीर भरे ये पिंगल लोचन,
पापी पातकी या अधम हो सकता हूं महा,
किन्तु शुद्ध हूं प्रतिक्षण तुम्हारे बात्सल्य रूपी अमृत में जब जब लेता नहा.

 

आशीष दीक्षित 

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