हे मात घृती, श्री, विवेक विद्या और वाणी में भी परा वाक् तुम्हारा है ऐसा ऐश्वर्य कि, शिशु है इससे विस्मित और अवाक्, हे माता हो सृजन की अधिष्ठात्री, कभी बन जाती हो शरद पूर्णिमा और कभी अमावस की घोर रात्रि ! हे मात शुद्ध व निश्छल बाल प्रेम, कर लेती हो तुम आत्मसात, विह्वल […]

