डेस्क:हरियाणा विधानसभा में पेश किए गए ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि एक गंभीर पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी की चेतावनी हैं। 18 से 45 वर्ष की ऊर्जावान आयु सीमा में 18,000 युवाओं की मौत यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हमारी जीवनशैली और पर्यावरण में ऐसा क्या बदला है जो ‘हार्ट अटैक’ अब बुढ़ापे की नहीं, बल्कि युवाओं की बीमारी बन गया है। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि सरकार ने अब तक इन मौतों का कोविड-19 संक्रमण या टीकाकरण से संबंध जानने के लिए कोई वैज्ञानिक अध्ययन या सर्वे नहीं कराया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अत्यधिक मानसिक तनाव, खान-पान में मिलावट, वायु प्रदूषण और शारीरिक सक्रियता की कमी इस ‘साइलेंट किलर’ को बढ़ावा दे रहे हैं। यदि समय रहते इन मौतों के सटीक कारणों का पता लगाकर निवारक स्वास्थ्य नीतियां (Preventive Health Policies) नहीं बनाई गईं, तो यह संकट आने वाली पीढ़ी के लिए और भी घातक साबित हो सकता है। विधायक ने सवाल किया था, ‘‘वर्ष 2020 से अब तक हरियाणा में सालाना और जिलावार 18 से 45 वर्ष के कितने युवाओं की दिल का दौरा पड़ने से मौत हुई है और क्या सरकार ने यह पता लगाने के लिए कोई अध्ययन या सर्वेक्षण कराया है कि क्या इन लोगों की मौत का कोविड-19 संक्रमण या कोविड-19 टीकाकरण से कोई संबंध है और यदि इसका जवाब हां है तो ऐसे अध्ययन अथवा सर्वेक्षण का निष्कर्ष क्या निकला और इस संबंध में सरकार ने क्या कार्रवाई की है।’
