डेस्क: अली खामेनेई (Ali Khamenei) की मौत की खबरों के बाद एक बार फिर उनके लंबे और विवादित राजनीतिक जीवन को लेकर चर्चा तेज हो गई है। तीन दशक से अधिक समय तक ईरान (Iran) के सर्वोच्च नेता रहे खामेनेई न केवल अपनी सख्त नीतियों के लिए जाने जाते थे, बल्कि एक ऐसी शारीरिक चोट के कारण भी सुर्खियों में रहे, जिसकी वजह से वह 45 वर्षों तक अपना दाहिना हाथ (Right Hand) सार्वजनिक रूप से छिपाए रखते थे।
1981 का जानलेवा हमला
यह घटना 1981 की है, जब खामेनेई ईरान के राष्ट्रपति थे और ईरान-इराक युद्ध का दौर चल रहा था। नमाज के बाद वह लोगों से मुलाकात कर रहे थे, तभी एक व्यक्ति ने उनकी मेज पर टेप रिकॉर्डर रख दिया। कुछ ही देर बाद उसमें जोरदार विस्फोट हुआ। हमले की जिम्मेदारी ‘फुरकान ग्रुप’ नामक संगठन ने ली थी और इसे इस्लामिक रिपब्लिक के लिए “तोहफा” बताया था।
इस धमाके में खामेनेई गंभीर रूप से घायल हो गए। महीनों अस्पताल में रहने के बाद उनकी जान तो बच गई, लेकिन उनका दाहिना हाथ हमेशा के लिए निष्क्रिय हो गया। उसमें लकवा मार गया था। बाद में उन्होंने कहा था, “मुझे एक हाथ की जरूरत नहीं है, अगर मेरा दिमाग और जुबान काम करते रहें तो यह काफी है।”
बायां हाथ उठाकर लेते थे शपथ
दाहिना हाथ बेकार हो जाने के कारण खामेनेई सार्वजनिक कार्यक्रमों में अक्सर उसे चोगे के भीतर छिपाए रखते थे। शपथ ग्रहण और अन्य औपचारिक मौकों पर वह बायां हाथ उठाते थे। यह दृश्य वर्षों तक उनकी पहचान का हिस्सा बना रहा।
1989 में रूहोल्ला खोमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई को ईरान का सर्वोच्च नेता चुना गया। हालांकि उस समय उनके चयन को लेकर विवाद भी हुआ, क्योंकि कुछ धर्मगुरुओं का मानना था कि उनके पास ‘ग्रैंड अयातुल्ला’ का दर्जा नहीं है। बाद में संविधान संशोधन के जरिए यह शर्त बदली गई और उन्हें आधिकारिक रूप से सर्वोच्च नेता का पद मिला।
सत्ता पर मजबूत पकड़
करीब 36 वर्षों तक सर्वोच्च नेता रहते हुए खामेनेई ने देश की राजनीति, सुरक्षा तंत्र और धार्मिक संस्थाओं पर व्यापक नियंत्रण स्थापित किया। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के साथ उनके करीबी संबंधों ने उनकी शक्ति को और मजबूत किया।
उनका जन्म 1939 में ईरान के मशहद शहर में हुआ था। किशोरावस्था में ही उन्होंने क्रांतिकारी इस्लामी विचारों को अपनाया और बाद में खोमैनी की विचारधारा ‘विलायत-ए-फकीह’ के प्रमुख समर्थक बने। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद उन्होंने सत्ता के विभिन्न पदों पर रहते हुए अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की।
खामेनेई का दाहिना हाथ भले ही काम न करता रहा हो, लेकिन ईरान की सत्ता पर उनकी पकड़ लंबे समय तक मजबूत बनी रही। 1981 के उस हमले ने उनके शरीर को कमजोर किया, मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति को और कठोर बना दिया और यही वजह है कि दशकों तक वह ईरानी राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते रहे। वहीं, अब अमेरिकी और इजराइली हवाई हमलों में उनकी मौत की खबर ने पश्चिम एशिया की राजनीति में भूचाल ला दिया है।
