
2023 षण्मासिक शोध पाठ्यक्रम का समापन
दरभंगा। संस्कृत विश्वविद्यालय मे षण्मासिक शोध पाठ्यक्रम के समापन पर आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो.लक्ष्मी निवास पाण्डेय ने कहा कि शोध कार्यों में हमेशा नूतन पद्धति का उपयोग श्रेष्ठकर होता है। शोध पद्धति एवं इनके चयन की विधियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा प्रवृत्ति से ही जिज्ञासाएं उत्पन्न होती है। शोध की विशिष्टता, उसकी नवीनता, वैज्ञानिकता समाज व शैक्षणिक दुनिया के सापेक्ष में होनी चाहिये। साथ ही उन्होंने कहा कि शोधार्थी एवं मार्गदर्शक के परस्पर समन्वय से ही शोध कार्यों में गहराई आती है। विशिष्ट अतिथि कुलसचिव प्रो. ब्रजेशपति त्रिपाठी ने कहा कि शोध में पर्यवेक्षक एवं शोध शीर्षक के चयन में शोधार्थी को विशेष ध्यान रखने की जरूरत है। शोधार्थी को गुणवत्तापूर्ण नूतन तथ्यों का अन्वेषण कर समय पर शोध कार्य पूर्ण कर लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि सच मे शोधकार्य एक बड़ी साधना है। उक्त जानकारी देते हुए पीआरओ निशिकांत ने बताया कि डीन प्रो.पुरेंद्र वारिक ने शोध विषय पर विस्तार से समझाया। कहा कि -शोध विषय ऐसा होना चाहिये कि शोधार्थी को शोध कार्यों में सहूलियत मिले। वहीं,संयोजक प्रो.दयानाथ झा ने शोध पाठ्यक्रम का विवरण विस्तार से प्रस्तुत किया। साथ ही, उन्होंने छात्रों से अनुरोध किया कि कक्षा में प्राप्त ज्ञान का अपने शोध संक्षिप्तिका में अवश्य उल्लेख करें । बताया गया कि 03 जुलाई 2025 से 2जनवरी 2026 तक चली कक्षा में करीब 85 गवेषक 2023 षण्मासिक शोध पाठ्यक्रम में शामिल रहे। इस तरह कुल 202 कक्षाओं का संचालन किया गया। करीब 25 प्रध्यापकों ने गवेषकों को अपने अनुभव का लाभ पहुंचाया।
मंजीत महेश झा के संचालन में हुए कार्यक्रम में स्वागत भाषण शोध प्रभारी प्रो.दिलीप कुमार झा ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन अमृत प्रसाद पोखरैल ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में षण्मासिक शोध कक्षा के सह संयोजक डॉ.वरुण कुमार झा, परीक्षा नियंत्रक डॉ.ध्रुव मिश्र,नोडल पदाधिकारी डॉ.रामसेवक झा, डॉ.धीरज कुमार पाण्डेय, डॉ.सुधीर कुमार, डॉ.संतोष तिवारी, डॉ.अवधेश श्रोत्रिय, डॉ.धर्मवीर सहित अन्य प्राध्यापक उपस्थित थे।