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नकल में भी अकल लगती है जनाब, जो आपके बस की बात नही

प्रयागराज :शहर में विदेशों में से सबक लेते हुए सड़क से लेकर चौराहे पर तक काफी काम महाकुंभ में किए गए. मगर, महिलाओं के लिए पिंक टॉयलेट बनाने में नगर निगम अपने ही देश के इंदौर और केरल जैसे प्रदेशों से सीख और सबक नहीं ले पा रहा है। पिंक टॉयलेट की कमी से जूझ रहे इस शहर में कामगाजी महिलाएं व पढ़ने वाली छात्राएं ही नहीं घर गृहस्थी के लिए मार्केटिंक करने के लिए निकलने वाली महिलाएं समस्या से जूझ रही हैं. कहने के लिए तो सावर्जनिक टॉयलेट यहां दो सौ से भी अधिक बनाए गए हैं. मगर इनमें पिंक टॉयलेट की संख्या महज तीन ही है. वह भी मार्केट या पॉश एरिया में नहीं है. हैरान करने वाली बात यह है कि इस समस्या को लेकर आज तक किसी एनजीओ ने भी कोई पहल करना या आवाज उठाना मुनासिब नहीं समझा. जबकि आए दिन तमाम संस्थाएं समाज व महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ने का दावा करते फिरती रहती हैं.

महिलाओं की उपेक्षा नहीं तो क्या है

विकास और भारत स्वच्छता मिशन एवं सरकार द्वारा शुरू की गई महिलाओं के लिए पिंक टॉयलेट की पहल को यहां के जिम्मेदार पलीता लगा चुके हैं. अब तक इस शहर में महिलाओं के लिए पिंक टॉयलेट का जबरदस्त अभाव है. जबकि लाखों महिलाएं हर रोज सरकारी व प्राइवेट नौकरनी करने के लिए घरों से बाहर सड़कों पर निकलती हैं. सिर्फ यही नहीं हजारों छात्राएं भी यहां देश और विदेश से भी आकर कॉरियर की तलाश में जुटी हैं, जो मार्केटिंक के लिए निकलती हैं वह अलग. फिर भी इस शहर में नगर निगम द्वारा महिलाओं के लिए महज तीन पिंक टॉयलेट बनाए गए हैं. उनमें भी ठीक से साफ सफाई नहीं है. नगर निगम स्मार्ट सिटी के तहत महाकुंभ में विदेशों में बनी सड़कें व चौराहों की नकल करके काफी काम कराया. विदेशी कल्चर पर चौराहे और यहां ब्रेकर तक बना दिए गए. मगर, अपने ही देख के इंदौर और केरल जैसे प्रदेशों द्वारा पिंक टॉयलेट को लेकर शुरू की गई पहल व किए गए कार्यों पर नगर निगम के जिम्मेदार एवं इंजीनियर आज तक नहीं कर सके. इसका परिणाम यह रहा कि खबरों रुपये महाकुंभ के दौरान विकास कार्यों में खर्च जरूर हुए मगर महिलाओं के लिए एक दर्द पिंक टॉयलेट की संख्या आधा दर्जन का भी आंकड़ा नहीं छू सकी.

बड़ा सवाल हैँ ये

यहां पिंक टॉयलेट की उपेक्षा का दंश महिलाओं को सफर व मार्केट में झेलना पड़ रहा है. महज तीन पिंक टॉयलेट को छोड़ दें तो यहां जरूरत पड़ने पर महिलाएं सार्वजनिक टॉयलेट को ही यूज करने के लिए मजबूर हो जाती हैं. संकोच करने वाली महिलाओं को उचित स्थान या घर पहुंचने तक यूरिन रोकना पड़ जाता है. इससे उनमें तमाम तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. अब ऐसे हालात में इसे आप महिलाओं की उपेक्षा नहीं और क्या कहेंगे…?

एजीओ की आंखों में भी बंधी है पट्टी

पिंक टॉयलेट के निर्माण में फिसड्डी इस शहर में सामाजिक कार्य करने का दम्भ भरने वाली किसी एनजीओ या अन्य कोई प्राइवेट कंपनी भी आज तक कोई पहल नहीं कर सकी है. तमाम प्राइवेट संस्थाएं ऐसी हैं जिनके कर्ताधर्ता आए दिन सरकारी विभागों में महिलाओं के लिए रोजगार प्रशिक्षण, शिक्षा जैसी अन्य योजनाओं के तहत काम कराने के लिए लाइन लगाए रहते हैं. दावा भी करते हैं कि वह सामाजिक कार्यों खासकर महिलाओं के हक और अधिकार दिलाने के लिए ही कार्य करते हैं. मगर, बात पिंक टॉयलेट के निर्माण की करें तो ऐसी एक भी एनजीओ या संस्थाएं नहीं है, जो कभी नगर निगम में इस महिलाओं की इस समस्या को लेकर आवाज उठाई हों.

समस्या का सटीक है यह समाधान

महाकुंभ में सैकड़ों की संख्या में खरीदे गए मोबाइल टॉयलेट मारे-मारे फिर रहे हैं. इनकी सफाई तो दूर पानी तक भरने वाला कोई नहीं है. यदि नगर निगम चाहे तो इसी मोबाइल टॉयलेट को ही पिंक टॉयलेट के रूप में महिलाओं के लिए जगह-जगह चौराहों के आसपास व मार्केट एरिया में लगा सकता है. इससे एक तो इस मोबाइल टॉयलेट का यूज बढ़ जाएगा और दूसरी बात यह कि महिलाओं की बड़ी समस्या भी समाप्त हो जाएगी. इसके लिए नगर निगम को सफाई के साथ इसकी देखरेफ के लिए महिला स्टॉफ को भी लगाना होगा. ताकि कोई भी इसमें तोड़फोड़ या गंदगी नहीं कर सके. इस तरह पिंक टॉयलेट की कमी भी दूर हो जाएगी.

फाइलों में प्लान का घुट गया दम

महाकुंभ से पूर्व शहर में एक दर्जन से अधिक एरिया में नगर निगम ने चालीस पिंक टॉयलेट बनाने का प्लान तैयार किया था. तत्कालीन नगर निगम पर्यावरण अधिकारी उत्तम वर्मा ने बताया था कि करीब 90 लाख रुपये के बजट का भी प्रबंध किया जा चुका है. जिन एरिया में निर्माण की लिस्ट बनाई गई थी उनमें पॉश इलाका सिविल लाइंस, चौक, कटरा, खुल्दाबाद, करेली, फाफामऊ, शांतिपुरम, धूमनगंज, सुलेमसराय व तेलियरगंज बाजार शामिल है. प्लान बनाने के बाद नगर निगम को इन इलाकों में उचित जगह पिंक टॉयलेट के लिए जमीन नहीं मिल सकी. जबकि हर जगह नगर निगम की जमीन पर ही लोगों ने कब्जा कर रखा है.

पिंक टॉयलेट के निर्माण के लिए बजट की कहीं कोई दिक्कत या समस्या नहीं है. नगर निगम के पास पर्याप्त बजट है, बसर्ते जहां पिंक टॉयलेट की अति आवश्यकता है उस एरिया में जमीन नहीं मिल रही है. अब किसी के घर या दुकान के सामने तो पिंक टॉयलेट का निर्माण तो कराया नहीं जा सकता.

 

 

 

 

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