भारत जिन चीजों को लेकर धनी माना जाता रहा है उसमें एक संस्कृत भाषा भी है : डॉ. मुस्ताक अहमद
दरभंगा। मंगलवार को स्थानीय सीएम कॉलेज में आयोजित संस्कृत संभाषण शिविर एवं संस्कृत अध्ययन केंद्र के उद्घाटन समारोह में ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत झा ने कहा संस्कृत भाषा को बोलने के लिए व्यवहार की जरूरत है, व्यवहार से बोलना,समझना कोई कठिन नहीं होता है। मुख्य वक्ता के रूप में उन्होंने कहा संपूर्ण शास्त्रीय ज्ञान संस्कृत के अंदर ही निहित है। संस्कृत ऐसी पूंजी है जिसके माध्यम से प्राचीन शास्त्रीय ग्रंथों तक अपनी पहुंच हम बना सकते हैं। शास्त्रीय ज्ञान के लिए तो व्याकरण की आवश्यकता है, किंतु भाषा बोलने के लिए सिर्फ अभ्यास और निरंतर की आवश्यकता है। व्याकरण भी कुछ कठिन नहीं है। कुछ शब्द रूप व धातु रूप यदि ध्यान में आ जाए तो अनेक शब्दों का भंडार स्वत: जमा हो जाता है। इस मौके पर मुख्य अतिथि कासिंद संस्कृत विश्वविद्यालय के व्याकरण-साहित्य संकायाध्यक्ष डॉ. दयानंद झा ने कहा कि संस्कृत, संस्कृति,धर्म यह भारत के तीन रत्न हैं। संस्कृत मात्र भाषा नहीं, यह जीवन भी है। बोलने से ही भाषा को जीवनी शक्ति मिलती है और इसमें प्रखरता आती है। आज विश्व बंधुत्व एवं संसार भर में हिंसावादी मनोवृति के निदान का माध्यम इसे बनाया जा सकता है। प्रधानाचार्य, डॉ. मुस्ताक अहमद ने कहा भारत जिन चीजों को लेकर धनी माना जाता रहा है उसमें एक संस्कृत भाषा भी है। इसके संरक्षण एवं संवर्धन का दायित्व संस्कृत का अध्यापन करने वालों पर अधिक है। भाषा धर्म की नहीं, बल्कि भौगोलिक परिस्थितियों की देन होती है। भारत भाषा के मामले में विश्व भर में सबसे धनी है। उन्होंने इस बात पर खेद जाताया कि संस्कृत रोजी-रोटी का माध्यम तो बना पर इसे विस्तार देने का कार्य उतना अधिक नहीं हो सका। कहा भूमंडलीकरण के दौर में हम इसके संरक्षण संवर्धन की दिशा में आगे कदम बढ़ाएं। संस्कृत को अपने तक ही केंद्रित न रखें, वरना यह विलुप्त हो जाएगी। आज भी हम संस्कृत के बल पर भारत की पताका विश्व भर में फहरा सकते हैं। इसे व्यवहार में लाएं और इससे अपने साथियों, संबंधियों एवं समाज के अन्य लोगों को भी जोड़ें। संभाषण शिविर के संयोजक अमित कुमार झा के संचालन में संपन्न इस कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के पद से पूर्व डीसी विवेकानंद झा ने कहा मोबाइल और कंप्यूटर के जमाने में आज पढ़ना कम देखना ज्यादा हो गया है जिससे हमारी सांस्कृतिक परंपरा पर चोट आ रही है। उन्होंने कहा संस्कृत अनुशासन भी है। पहले माना जाता था कि आप किसी भाषा में निष्णात हैं तो उसमें सिद्धता तभी संभव है जब आप उसका अध्यापन करते हों। उन्होंने छात्रों से समय के सदुपयोग का अनुरोध किया और इस बात के लिए संकल्पित होने को कहा संस्कृत सीख कर कम से कम दो लोगों को संस्कृत सिखने का दायित्व भी ग्रहण करें। प्रशिक्षु छात्रा रश्मि कुमारी, अन्नू कुमारी और शांभवी कुमारी के समवेत संस्कृत भाषा में स्वागत गान से आरंभ कार्यक्रम में बतौर विशिष्ट अतिथि महाविद्यालय के मैथिली विभाग के डॉ. अमलेन्दु शेखर पाठक ने कहा संस्कृत राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को सबल करने वाली भाषा है। आज जितनी भी समस्याएं हैं भले वह चारित्रिक पतन से संबंधित हो या अन्य तथ्यों से उसका निदान संस्कृत के माध्यम से किया जा सकता है। संस्कृत हमें सुसंस्कृत भी करता है। संस्कृत की यह महत्वपूर्ण विशेषता है कि इसमें एकरूपता इस कदर विद्यमान है कि यह देश-विदेश के किसी भी कोने में लिखा-पढ़ा जाए इसका स्वरूप नहीं बदलता है। दस दिनों के भीतर संस्कृत में धारा प्रवाह संभाषण करना संस्कृत में ही संभव है। आरंभ में विभागाध्यक्ष डॉ. संजीत कुमार झा सरस ने आगत अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा संभाषण शिविर प्रयोग सिद्ध कार्यक्रम है। महाविद्यालय के संस्कृत अध्ययन केंद्र में एक वर्ष का सर्टिफिकेट एवं डिप्लोमा कोर्स संचालित है। दसवीं पास कोई भी व्यक्ति भले ही वह महाविद्यालय के छात्र न भी हों। इस शिविर में भाग ले सकते हैं। यह पूर्णत: निशुल्क है और दस दिनों के भीतर प्रशिक्षुओं को बोलने में निपुण करना संभव होता है। प्रधानाचार्य के सतत सहयोगी रुख को उत्साहवर्धक बताते हुए उन्होंने महाविद्यालय में संचालित स्नातकोत्तर कक्षा में छात्रों के नामांकन की स्थिति पर भी संतोष व्यक्त किया। प्राध्यापक डॉ. सुरेंद्र भारद्वाज, डॉ. विशेष कुमार चतुर्वेदी, डॉ. फैजान हैदर समेत अच्छी तादाद में प्रशिक्षु छात्र-छात्राओं व अन्य ने अपनी अपनी सहभागिता दी।