डेस्क : शारदीय नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की आराधना और भक्ति के लिए बेहद खास माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में मां दुर्गा की उपासना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से सृष्टि की रचना की थी। उन्हें ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा विधि, शुभ मंत्र, प्रिय भोग, आरती, पूजा में रंग का महत्व और व्रत कथा के बारे में।
मां कूष्मांडा व्रत पूजा विधि (Maa Kushmanda Puja Vidhi)
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा को समर्पित पूजन करने के लिए सुबह उठकर स्नान करें और हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम करें। इसके बाद व्रत और पूजन का संकल्प लें और मां कूष्मांडा सहित सभी देवियों की पूजा करें। पूजा के दौरान माता रानी की कथा सुनें, मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती उतारकर माता के प्रिय भोग का प्रसाद वितरित करें।
कूष्मांडा देवी के मंत्र (Maa Kushmanda Mantra)
मुख्य मंत्र
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः
बीज मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नमः
स्तुति मंत्र
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
ध्यान मंत्र
वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्मांडा यशस्वनीम्॥
मंत्र का 108 बार जाप करने से अधिक लाभकारी माना जाता है।
कूष्मांडा देवी का प्रिय भोग (Maa Kushmanda Bhog)
मां कूष्मांडा को हरे रंग के फल बहुत प्रिय हैं। जैसे हरे केले, अंगूर और शरीफ फल। इसके अलावा माता को मालपूए का भोग भी अत्यंत प्रिय है। कहा जाता है कि माता को उनके पसंद का भोग लगाने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
मां कूष्मांडा का प्रिय रंग
मां कूष्मांडा को पीला, नारंगी और हरा रंग प्रिय हैं। यह रंग ऊर्जा, प्रसन्नता और गति के प्रतीक माने जाते हैं। नवरात्रि के चौथे दिन इन रंगों के वस्त्र पहनना शुभ होता है।
मां कूष्मांडा व्रत कथा
देवी दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा अपनी मंद, हल्की मुस्कान के द्वारा ब्रह्मांड को उत्पन्न करने की वजह से इस देवी को कूष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, हर ओर अंधकार ही अंधकार था, तब देवी कूष्मांडा ने अपने मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी, इसी वजह से इन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा के नाम से भी जाना जाता है। मां कूष्मांडा देवी की 8 भुजाएं हैं, जिस वजह से उन्हें अष्टभुजा भी कहा जाता है. माता के सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। मां का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े (कद्दू) की बलि प्रिय है। मां कूष्मांडा का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की असीम शक्ति और क्षमता मां कूष्मांडा में ही है। इसी वजह से इनके शरीर में कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यामन है।


