डेस्क: आमतौर पर मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों (Diseases) को बारिश और जलभराव (Rain and Waterlogging) से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन ब्राजील (Brazil) में सामने आई एक घटना ने वैज्ञानिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि भयंकर सूखा भी खतरनाक बीमारियों के फैलने की वजह बन सकता है। साइंस एडवांसेस में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, 2015 में पड़े भीषण सूखे ने जंगल में मौजूद येलो फीवर वायरस के इंसानों तक पहुंचने की परिस्थितियां पैदा कर दी थीं।
इसका असर कुछ समय बाद दिखाई दिया। 2016 के अंत से ब्राजील के शहरों में येलो फीवर के मामले तेजी से सामने आने लगे। 2016 से 2019 के बीच 2,000 से ज्यादा लोग संक्रमित हुए और करीब 750 लोगों की मौत हुई। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि ब्राजील के शहरी इलाकों में करीब सात दशक बाद इस बीमारी का बड़ा प्रकोप देखने को मिला।
2015 के सूखे ने बदल दिया जंगल का पूरा समीकरण
शोधकर्ताओं के मुताबिक, 2015 में अल नीनो के प्रभाव के कारण मध्य दक्षिण अमेरिका और ब्राजील के कई हिस्सों में बेहद गंभीर सूखा पड़ा। इसे असाधारण स्तर का सूखा माना गया। नदियों और जंगलों के छोटे जलस्रोत सूखने लगे और पानी तथा भोजन की कमी से इंसानों के साथ-साथ वन्यजीव भी प्रभावित हुए।
पानी और भोजन की तलाश में बंदर जंगलों से निकलकर मानव बस्तियों के आसपास पहुंचने लगे। इनमें कुछ ऐसे बंदर भी थे जो येलो फीवर वायरस से संक्रमित थे। यही वह स्थिति थी जिसने जंगल में सीमित रहने वाली बीमारी के इंसानों तक पहुंचने का रास्ता तैयार किया।
मच्छरों ने कैसे बदला इंसानों तक पहुंचने का रास्ता?
येलो फीवर वायरस जंगलों में मुख्य रूप से Haemagogus प्रजाति के मच्छरों के जरिए फैलता है। सामान्य परिस्थितियों में ये मच्छर जंगलों में रहने वाले बंदरों को काटते हैं और वायरस का चक्र वन्यजीवों के बीच ही चलता रहता है। इंसान इस चक्र से काफी हद तक बाहर रहते हैं।
लेकिन सूखे ने परिस्थितियां बदल दीं। अध्ययन के मुताबिक, पानी की कमी के कारण मच्छरों पर भी दबाव बढ़ा और उन्होंने भोजन के लिए ज्यादा सक्रियता दिखाई। दूसरी ओर, संक्रमित बंदर भी जंगल छोड़कर शहरों और इंसानी आबादी के करीब पहुंचने लगे।
इस तरह संक्रमित वन्यजीव और वायरस फैलाने वाले मच्छर दोनों इंसानी बस्तियों के करीब आ गए। इसके बाद मच्छरों ने इंसानों को काटना शुरू किया और येलो फीवर का संक्रमण जंगल से निकलकर शहरों तक पहुंच गया।
1942 के बाद शहरों में फिर लौटा प्रकोप
ब्राजील के शहरी इलाकों में येलो फीवर का आखिरी बड़ा प्रकोप 1942 में दर्ज किया गया था। इसके बाद टीकाकरण और मच्छर नियंत्रण जैसे उपायों से शहरी इलाकों में बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया था।
लेकिन 2015 के सूखे के बाद हालात बदल गए। 2016 के अंत में संक्रमण के मामले बढ़ने लगे और अगले कुछ वर्षों में हजारों लोग इसकी चपेट में आ गए। मिनास गेरैस राज्य में बीमारी का प्रभाव विशेष रूप से गंभीर रहा।
वैज्ञानिकों को अब किस बात का डर?
बाद में बड़े पैमाने पर टीकाकरण और मच्छर नियंत्रण अभियान चलाकर संक्रमण को रोकने की कोशिश की गई। लेकिन इस घटना ने वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—जलवायु में होने वाला बदलाव किस तरह जंगलों में मौजूद बीमारियों को इंसानों के करीब ला सकता है?
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ब्राजील में इस तरह की परिस्थितियां लगभग हर 25 साल में दोबारा बन सकती हैं। यदि भविष्य में फिर बेहद गंभीर सूखा पड़ा, तो पानी और भोजन की तलाश में वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर आ सकते हैं और उनके साथ बीमारी फैलाने वाले मच्छरों के पहुंचने का खतरा भी बढ़ सकता है।
यानी यह मामला सिर्फ येलो फीवर तक सीमित नहीं है। यह घटना इस बात का संकेत है कि मौसम में बड़े बदलाव, वन्यजीवों के व्यवहार और संक्रामक बीमारियों के बीच संबंध को समझना भविष्य में नई महामारियों को रोकने के लिए बेहद जरूरी होगा।

