पटना: बिहार की राजनीति इस समय एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अब सबसे ज्यादा चर्चा मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर है। इसी बीच उनका दिल्ली दौरा राजनीतिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर गया है। माना जा रहा है कि इस दौरे के दौरान उन्होंने शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात कर संभावित मंत्रियों के नामों पर चर्चा की है।
दरअसल, बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की है—जातीय समीकरण, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका को साधना आसान नहीं दिख रहा। यही वजह है कि मंत्रिमंडल विस्तार में देरी हो रही है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि हर वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व मिले, ताकि आने वाले चुनावों में संगठन और सरकार के बीच तालमेल बना रहे।
सबसे ज्यादा चर्चा विजय कुमार सिन्हा को लेकर है। पूर्व डिप्टी सीएम रहे सिन्हा के कद के अनुसार उन्हें साधारण मंत्रालय देना आसान नहीं है। ऐसे में उनके लिए संगठन में बड़ी जिम्मेदारी या किसी अहम पद की संभावना जताई जा रही है। यही एक बड़ा कारण है जिससे मंत्रियों की सूची को अंतिम रूप देने में समय लग रहा है।
वहीं, संभावित दावेदारों में जीवेश मिश्रा का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है। जाले जैसी कठिन सीट से लगातार जीत ने उनकी दावेदारी को मजबूत किया है। इसके अलावा तेघड़ा से विधायक रजनीश कुमार भी संगठन और अनुभव के आधार पर मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।
राजनीतिक समीकरणों में वैश्य और दलित वर्ग की भागीदारी भी अहम मानी जा रही है। इसी कड़ी में दीघा के विधायक संजीव चौरसिया और विधान परिषद सदस्य राजेंद्र गुप्ता के नामों की भी चर्चा तेज है। पार्टी इन वर्गों को साधकर अपने सामाजिक आधार को और मजबूत करना चाहती है।
कुल मिलाकर, यह मंत्रिमंडल विस्तार सिर्फ पदों का बंटवारा नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों की रणनीति का अहम हिस्सा है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि दिल्ली से हरी झंडी कब मिलती है और बिहार की नई सरकार का पूरा स्वरूप कब सामने आता है।
आशुतोष झा

