डेस्क: लंबे और तीखे राजनीतिक टकराव (Political conflict) के बीच महिला आरक्षण (Women’s reservation) से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक (Constitutional Amendment bill) लोकसभा में पास नहीं हो सका। करीब 20 घंटे की मैराथन बहस और ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर वोट देने की अपील के बावजूद सरकार जरूरी आंकड़ा हासिल करने में नाकाम रही।
क्या रहे वोटिंग के आंकड़े?
‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक’ को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोट की जरूरत थी, लेकिन इसके पक्ष में सिर्फ 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने विरोध किया। कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया और विधेयक 54 वोट से पीछे रहकर गिर गया।
संसद में क्या हुआ?
विधेयक पर लोकसभा में दो दिन तक लंबी बहस चली। पहले दिन करीब 14 घंटे तक चर्चा हुई, जो रात 1 बजे के बाद तक जारी रही। दूसरे दिन भी सुबह से शाम तक बहस चली, लेकिन अंत में सरकार समर्थन जुटाने में सफल नहीं हो पाई।
सरकार की अपील भी नहीं चली
वोटिंग से पहले नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया के जरिए सांसदों से “अंतरात्मा की आवाज” पर वोट करने की अपील की थी। साथ ही विपक्ष को बिल का श्रेय लेने के लिए “ब्लैंक चेक” देने की बात भी कही, लेकिन इसका असर नहीं दिखा।
बीजेपी का आरोप, विपक्ष जिम्मेदार
विधेयक गिरने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष पर निशाना साधा। गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य दलों को जिम्मेदार ठहराया और बिल गिरने पर जश्न मनाने को निंदनीय बताया।
वहीं, कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक को सदन में पेश किया था और बहस का जवाब भी दिया।
विपक्ष का क्या तर्क?
विपक्षी दलों ने कहा कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे परिसीमन (Delimitation) से जोड़ने का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना था कि पहले परिसीमन का मुद्दा स्पष्ट किया जाए, तभी कानून लागू हो।
सदन के बाहर भी सियासत तेज
विधेयक गिरने के बाद बीजेपी की महिला सांसदों ने संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन किया और पार्टी ने 18 अप्रैल से देशभर में आंदोलन का ऐलान किया है।
महिला आरक्षण पर सहमति के दावे के बावजूद राजनीतिक मतभेद इतने गहरे रहे कि विधेयक पास नहीं हो सका। अब यह मुद्दा संसद से निकलकर सड़कों और चुनावी मंचों तक पहुंच चुका है—जहां इसकी गूंज आगे भी सुनाई देती रहेगी।

