डेस्क: पहलगाम हमले (Pahalgam Attacks) में अपनी जान गंवाने वाले इकलौते मुस्लिम पोनी ऑपरेटर सैयद आदिल हुसैन शाह (Syed Adil Hussain Shah) का परिवार अब एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। उनका परिवार, जो अब तक लगभग 40 साल पुराने मिट्टी और लकड़ी के जर्जर घर में रह रहा था, अब एक नए पक्के एक मंजिला मकान (New Home) में शिफ्ट होने की तैयारी कर रहा है।
यह नया घर करीब 10–12 लाख रुपये की लागत से तैयार किया गया है, जिसका निर्माण महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे की पार्टी की पहल पर कराया गया है। परिवार की इच्छा है कि हमले की पहली बरसी पर शिंदे उनसे मुलाकात करें, जिसके बाद वे इस नए घर में प्रवेश करेंगे।
पर्यटकों को बचाते हुए दी थी जान
आदिल हुसैन शाह की कहानी आज पूरे देश में साहस और इंसानियत की मिसाल के रूप में देखी जाती है। बताया जाता है कि हमले के दौरान उन्होंने पर्यटकों को बचाने की कोशिश में एक आतंकवादी की राइफल तक पकड़ ली थी। इसी दौरान वे शहीद हो गए। वे अपने परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे, और उनकी अचानक मौत ने परिवार को गहरे संकट में डाल दिया था।
आर्थिक स्थिति में आया सुधार
बीते एक साल में परिवार की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है। उन्हें सरकारी और गैर-सरकारी स्रोतों से करीब 20 लाख रुपये की सहायता भी मिली है, जिससे उनके जीवन में स्थिरता आई है।
परिवार को मिला नया सहारा
आदिल की पत्नी नाजिम को मत्स्य विभाग में स्थायी नौकरी मिली है, जिससे नियमित आय शुरू हुई है। भाई नजाकत को वक्फ बोर्ड में दिहाड़ी काम मिला है। दूसरे भाई नौशाद अब लगभग 12 लाख रुपये की एक कैब के मालिक बन चुके हैं, जबकि पहले वे टैक्सी चलाते थे।
पिता की भावुक बातें
आदिल के पिता सैयद हैदर शाह कहते हैं कि आर्थिक हालात अब पहले से बेहतर हैं, लेकिन बेटे की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती। उनके अनुसार, “पैसों की कोई कमी नहीं रही, लेकिन आदिल की याद हर पल सताती है। वह छोटी कमाई में भी परिवार को खुश रखता था।”
साहस और इंसानियत की मिसाल
परिवार के अनुसार, उस दिन कई लोग अपनी जान बचाकर भाग गए थे, लेकिन आदिल ने दूसरों को बचाने का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि वह चाहें तो खुद बच सकते थे, लेकिन उन्होंने इंसानियत को प्राथमिकता दी।
परिवार का यह भी कहना है कि आदिल की बहादुरी को देशभर से सराहना मिल रही है, और लोग उनके घर आकर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। वहीं, परिवार महसूस करता है कि कश्मीर के भीतर और बाहर उनकी शहादत को अलग-अलग नजरों से देखा जाता है, लेकिन आदिल ने धर्म से ऊपर उठकर सिर्फ इंसानियत के लिए अपनी जान दी।

