कोलकाता के सियासी गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, टीएमसी के भीतर की गुटबाजी अब एक खुली जंग में तब्दील हो चुकी है, जिसके बाद तृणमूल कांग्रेस का आड़ा-तिरछा विभाजन तय माना जा रहा है. इस बड़े उलटफेर ने राज्य से लेकर देश भर के राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है.
बता दें कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के महज एक महीने के भीतर राज्य की राजनीति में अब तक का सबसे बड़ा और अप्रत्याशित भूचाल आ चुका है. पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) आधिकारिक तौर पर दोफाड़ होने की कगार पर पहुंच गई है.
59 बागी विधायक एकसाथ विधानसभा पहुंचे
आज सुबह ठीक 10 बजे ऋतब्रता बनर्जी और संदीपान साहा के नेतृत्व में टीएमसी के बागी विधायकों का एक बहुत बड़ा हुजूम अचानक विधानसभा पहुंच गया. सूत्रों का दावा है कि पार्टी के कुल 80 विधायकों में से दो-तिहाई से कहीं अधिक, यानी कुल 59 नाराज विधायक अब ऋतब्रता बनर्जी के पाले में खड़े हो चुके हैं. इन सभी विधायकों ने एक संयुक्त पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे विधानसभा अध्यक्ष रथेंद्र बसु को सौंपने की तैयारी की जा चुकी है.
ममता के धरने में दिखी कम संख्या
राजनीतिक गलियारों में दावा किया जा रहा है कि अब पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के साथ महज 21 विधायक ही शेष बचे हैं. इस दावे को मंगलवार को तब और हवा मिल गई जब कोलकाता के वाई चैनल पर आयोजित ममता बनर्जी के धरने में पूरी पार्टी से सिर्फ 6 विधायक और 5 सांसद ही शामिल होने पहुंचे. विधायकों की इस बेहद कम संख्या ने खुद टीएमसी नेतृत्व को भी गहरे संकट में डाल दिया है.
ऋतब्रता को विपक्ष का नेता बनाने का दांव
ऋतब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाला यह बागी गुट अब पूरी ताकत के साथ विधानसभा में खुद को असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुट गया है. बागी विधायकों के दस्तखत वाले पत्र के जरिए विधानसभा अध्यक्ष से मांग की जा रही है कि ऋतब्रता बनर्जी को आधिकारिक तौर पर विपक्ष का नेता घोषित किया जाए. इसके साथ ही संदीपान साहा को उप-विपक्ष का नेता और मुर्शिदाबाद के विधायक अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाने का प्रस्ताव रखा गया है.
दिग्गज और अल्पसंख्यक नेताओं की बड़ी बगावत
इस विद्रोह की सबसे खास बात यह है कि इसमें ममता बनर्जी के पुराने और सबसे भरोसेमंद सिपहसालार शामिल हैं. बागी गुट में पूर्व मंत्री जावेद खान, शूलि साहा, वीरभूम के कद्दावर नेता काजल शेख, पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा, मुर्शिदाबाद के विधायक नियामत शेख, सामशेरगंज के विधायक मोहम्मद नूर आलम, उत्तर दिनाजपुर के विधायक गुलाम रब्बानी, डोमजूर के विधायक तापस मैती और हावड़ा मध्य के विधायक अरूप राय जैसे कद्दावर नाम शामिल हैं. मालदा की विधायक और पूर्व मंत्री साबीना यास्मीन ने खुलेआम ऋतब्रता बनर्जी का समर्थन कर दिया है. इसके अलावा, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों के अधिकांश अल्पसंख्यक विधायक भी इसी बागी गुट के साथ खड़े नजर आ रहे हैं.
फर्जी हस्ताक्षर पर भी छिड़ी कानूनी जंग
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में एक बड़ा कानूनी मोड़ तब आया, जब अभिषेक बनर्जी की तरफ से विधानसभा भेजे गए एक पत्र पर बागी विधायकों ने अपने फर्जी हस्ताक्षर होने का आरोप लगा दिया. ऋतब्रता बनर्जी और संदीपान साहा ने स्पीकर से लिखित शिकायत की है कि विधायकों की मर्जी के बिना उनके दस्तखत का गलत इस्तेमाल किया गया है. इस गंभीर शिकायत के बाद राज्य की सीआईडी (CID) ने मामले की जांच शुरू कर दी है.

