
दरभंगा। दिल्ली मोड़ स्थित राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र मखाना उत्पादन और शोध के क्षेत्र में लगातार नई ऊंचाइयाँ छू रहा है। मखाना की सांस्कृतिक और आर्थिक महत्ता को देखते हुए इस केंद्र की स्थापना 2 फरवरी 2002 को की गई थी। हालांकि 2005 में इसका राष्ट्रीय दर्जा वापस लेने में सफलता हासिल किया। लेकिन लंबे प्रयासों के बाद 15 मई 2023 को इसे फिर से राष्ट्रीय स्तर का दर्जा मिल गया। पिछले करीब दो दशकों में इस केंद्र ने मखाना के शोध,उत्पादन,प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग), किसानों को प्रशिक्षण और नए उद्यम तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है। प्रमुख उपलब्धियां (2002–2023) केंद्र ने मखाना की पहली उन्नत किस्म “स्वर्ण वैदेही” विकसित की जिसकी उत्पादन क्षमता लगभग 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसके अलावा मखाना की खेती के लिए पानी और पोषण प्रबंधन,रोग नियंत्रण जैसी आधुनिक तकनीकें भी तैयार की गईं। किसानों के लिए यह बड़ी राहत रही कि अब कम पानी (1 से 1.5 फीट गहराई) में भी मखाना की अच्छी पैदावार संभव हो गई है। इससे लागत कम हुई और आमदनी बढ़ी। मखाना के साथ मछली पालन की तकनीक भी विकसित की गई,जिससे एक ही जमीन से ज्यादा उत्पादन और आय मिल रही है। केंद्र द्वारा मखाना प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर कई प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए,जिनसे हजारों किसान और छोटे उद्यमी लाभान्वित हुए हैं। इन्हीं प्रयासों का परिणाम है पिछले 10 सालों में मखाना की खेती का क्षेत्र 13,000 हेक्टेयर से बढ़कर लगभग 40,000 हेक्टेयर हो गया है। अब मखाना सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है,बल्कि देश के कई अन्य राज्यों में भी इसकी खेती शुरू हो चुकी है। 2023 के बाद की नई उपलब्धियां राष्ट्रीय दर्जा मिलने के बाद केंद्र की गतिविधियों में तेजी आई है। अब मखाना के साथ कमल,सिंघाड़ा, मछली और अन्य जलीय फसलों पर भी शोध शुरू किया गया। मखाना प्रसंस्करण को आसान और सस्ता बनाने के लिए नई तकनीकों पर काम हो रहा है। साथ ही मशीनों के जरिए मखाना तैयार करने की दिशा में भी तेजी से प्रगति हुई है। केंद्र में आधुनिक प्रयोगशालाएं बनाई गई हैं और एक मखाना उद्यमिता केंद्र भी स्थापित किया गया है,जहां किसानों और युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाता है। अब तक लगभग 2500 नए किसानों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इसके अलावा सिंघाड़ा की दो नई किस्में “स्वर्ण हरित” और “स्वर्ण लोहित”भी विकसित की गई है।जिनमें कांटे नहीं होते और पैदावार ज्यादा होती है। मखाना निकालने के लिए एक नई मशीन का परीक्षण भी सफल रहा है,जिसे जल्द ही किसानों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। वैज्ञानिकों का योगदान मखाना अनुसंधान को आगे बढ़ाने में वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। खासकर डॉ. एस. एन. झा का योगदान बेहद अहम माना जाता है। उन्होंने 1989 में पहली मखाना पॉपिंग मशीन विकसित की,जिससे मखाना प्रोसेसिंग में बड़ा बदलाव आया। मखाना अनुसंधान केंद्र को दोबारा राष्ट्रीय दर्जा दिलाने और मखाना को पहचान दिलाने में भी उनका बड़ा योगदान रहा है। केंद्र में मखाना से जुड़े नए उत्पाद जैसे मखाना खीर मिक्स,फैट-फ्री फ्लेवर्ड मखाना आदि भी तैयार किए जा रहे हैं,जिससे किसानों और उद्यमियों को नए अवसर मिल रहे हैं। भविष्य की दिशा राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा आने वाले समय में मखाना की खेती को और बढ़ाने,किसानों की आय बढ़ाने और नई तकनीकों के विकास पर लगातार काम करता रहेगा। केंद्र का लक्ष्य है कि कम लागत में ज्यादा उत्पादन हो,बेहतर प्रसंस्करण तकनीक विकसित हो और मखाना को देश-विदेश में नई पहचान मिले। कुल मिलाकर,दरभंगा का यह केंद्र मखाना को एक बड़े उद्योग के रूप में विकसित करने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है,जिससे किसानों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव आ रहा है।