अंतरराष्ट्रीय

ईरान पर हमले के बाद अमेरिका कूटनीतिक रूप से घिरा? ट्रंप के फैसले से कई सहयोगी नाराज़

डेस्क: अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) द्वारा ईरान (Iran) पर सैन्य कार्रवाई शुरू किए जाने के बाद अमेरिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले से कहीं अधिक अलग-थलग नजर आ रहा है। इजराइल (Israel) के साथ मिलकर शुरू किए गए इस अभियान में अमेरिका (United Nations) की मंजूरी नहीं ली गई और कई पारंपरिक सहयोगियों का समर्थन भी नहीं मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम के दूरगामी कूटनीतिक और रणनीतिक असर हो सकते हैं।

इस सैन्य कार्रवाई के शुरुआती दौर में ही ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei के मारे जाने की खबर सामने आई, जिसके बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया।

पहले के युद्धों में अमेरिका को मिला था व्यापक समर्थन
विश्लेषकों के अनुसार, यह स्थिति पहले के अमेरिकी सैन्य अभियानों से अलग है।
1991 के Gulf War के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति George H. W. Bush ने एक विशाल अंतरराष्ट्रीय गठबंधन तैयार किया था। वहीं 2003 में George W. Bush के नेतृत्व में Iraq पर हमले को लेकर विवाद जरूर हुआ, लेकिन तब भी अमेरिका को कई प्रमुख सहयोगियों का समर्थन मिला था।
इसके विपरीत, मौजूदा संघर्ष में ट्रंप प्रशासन ने व्यापक गठबंधन बनाने की कोशिश कम ही की है।
सहयोगियों से बढ़ा तनाव
ट्रंप की रणनीति को लेकर कई पश्चिमी देशों में असहजता देखी जा रही है।
ब्रिटेन: ब्रिटेन के प्रधानमंत्री Keir Starmer ने अमेरिकी विमानों को अपने ठिकानों के सीमित इस्तेमाल की ही अनुमति दी। इस पर ट्रंप ने उनकी आलोचना करते हुए कहा कि “हम किसी Winston Churchill से डील नहीं कर रहे हैं।”

स्पेन: प्रधानमंत्री Pedro Sánchez ने अमेरिकी सेना को अपने सैन्य अड्डों के उपयोग से मना कर दिया, जिसके बाद ट्रंप ने स्पेन के साथ व्यापार बंद करने की धमकी दी।
फ्रांस और जर्मनी: फ्रांसीसी राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया। वहीं जर्मनी के चांसलर Friedrich Merz ने संघर्ष जल्द खत्म होने की उम्मीद जताई।
संयुक्त राष्ट्र की भूमिका से दूरी
इस सैन्य कार्रवाई से पहले United Nations से किसी तरह की अनुमति नहीं ली गई। जर्मन मार्शल फंड की विशेषज्ञ Kristina Kausch का कहना है कि इससे यह संदेश जाता है कि अमेरिका खुद को अंतरराष्ट्रीय नियमों से ऊपर मान रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के कारण अमेरिका कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से दूरी बना चुका है।

समर्थन और सावधानी दोनों
कुछ देशों ने अमेरिकी कदम का समर्थन भी किया।
Argentina और Paraguay के दक्षिणपंथी नेताओं ने इसे ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए जरूरी बताया।
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री Anthony Albanese ने भी समर्थन जताया।
वहीं कनाडा के प्रधानमंत्री Mark Carney ने समर्थन के साथ-साथ तनाव कम करने की अपील की।
भारत के पास हुई घटना ने बढ़ाया विवाद
इस संघर्ष के बीच United States की कार्रवाई उस समय विवादों में आ गई जब श्रीलंका के तट के पास India की सद्भावना यात्रा से लौट रहे एक ईरानी युद्धपोत को निशाना बनाया गया। इस हमले में दर्जनों ईरानी नाविकों के मारे जाने की खबर सामने आई।
यह घटना ऐसे समय हुई जब अमेरिकी रक्षा मंत्री Pete Hegseth ने युद्ध में “पुराने नियमों” को न मानने की बात कही थी।
चीन और रूस के लिए क्या मायने
इस पूरे घटनाक्रम पर China और Russia की भूमिका भी चर्चा में है। दोनों देशों के ईरान से करीबी संबंध हैं, लेकिन वे सीधे सैन्य टकराव से दूर दिखाई दे रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका के मध्य पूर्व में उलझने से चीन को रणनीतिक फायदा मिल सकता है। इससे उसे Taiwan जैसे मुद्दों पर अपनी रणनीति मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।
सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी के विश्लेषक Jacob Stokes का कहना है कि चीन के रणनीतिकार इस स्थिति को करीब से देख रहे हैं, क्योंकि अमेरिका का ध्यान फिर से मध्य पूर्व की ओर केंद्रित होता दिखाई दे रहा है।

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