डेस्क:क्या रिश्तों की खामोशी भी अब सलाखों के पीछे पहुंचा सकती है? ज़रा सोचिए, वैवाहिक जीवन में होने वाली वो अनबन, जहाँ नाराज़गी में पति-पत्नी एक-दूसरे से बात करना बंद कर देते हैं। क्या वो जेल जाने की वजह बन सकती है? एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट पर पहुँचा, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। ‘मौन’ और ‘अपराध’ के इसी उलझे हुए ताने-बाने पर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा अजब-गजब और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो आज के समय में हर शादीशुदा जोड़े के लिए जानना बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं कानून और जज्बात से जुड़े इस बेहद संवेदनशील मामले में अदालत ने ऐसा क्या कह दिया, जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि पत्नी की आत्महत्या से पहले पति का 13 दिन तक चुप रहना, मात्र से उसे क्रूरता के आरोप में जेल नहीं भेजा जा सकता। कोर्ट ने आईपीसी की धारा 498ए (जो बीएनएस की धारा 85 के समकक्ष है) के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मतभेद और संवादहीनता वैवाहिक जीवन का हिस्सा हैं और उत्पीड़न के ठोस सबूत के बिना मात्र संवादहीनता मानसिक क्रूरता नहीं मानी जा सकती। मायके में रह रही पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति की सजा को रद्द करते हुए कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि फोन पर उससे बात करने से इनकार करना आईपीसी की धारा 498ए के तहत क्रूरता थी। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि कोई कृत्य मानसिक क्रूरता है या नहीं, यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कोर्ट ने कहा कि कोई एक समान मानक नहीं हो सकता, क्योंकि व्यक्तियों की संवेदनशीलता, मानसिक दृढ़ता और भावनात्मक प्रतिक्रियाएं भिन्न होती हैं।

