डेस्क: पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ते तनाव के बीच सुरक्षित निवेश (Safe Investment) की मांग में तेज उछाल देखने को मिला है। इसके चलते सोना (gold) और चांदी (Silver) की कीमतों में जोरदार तेजी दर्ज की गई। चांदी की कीमत 10460 रुपये बढ़कर 2.92 लाख रुपये प्रति किलो पर पहुंच गई। वहीं सोने का भाव 5260 रुपये बढ़कर 1.67 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने-चांदी का हाल
वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ने से निवेशकों ने तेजी से कीमती धातुओं की ओर रुख किया, जिससे कॉमेक्स पर सोना 5,400 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गया और इंट्राडे में 2.5% से अधिक की बढ़त दर्ज की। वहीं, चांदी की कीमत भी तेज उछाल के साथ खुली और शुरुआती कारोबार में 96.93 डॉलर प्रति औंस के इंट्राडे हाई तक पहुंच गई, जो करीब 2% की तेजी को दर्शाता है।
पश्चिम एशिया में क्या है स्थिति?
रिपोर्ट के मुताबिक, वाशिंगटन और तेहरान के बीच वार्ता अगले सप्ताह भी जारी रहेगी। मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे ओमान ने बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति का संकेत दिया है, हालांकि सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि अमेरिकी अधिकारी प्रगति की गति से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। इस बीच अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है। इसका सीधा असर सोने-चांदी की कीमतों पर दिख रहा है।
सोने-चांदी की कीमतों को लेकर विशेषज्ञों का क्या अनुमान?
विशेषज्ञों का मानना है कि भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ने की स्थिति में कीमती धातुओं में और तेजी आ सकती है। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के कमोडिटी रिसर्च हेड हरीश वी के अनुसार, चरम परिस्थितियों में वैश्विक स्तर पर सोना 6,000 डॉलर प्रति औंस और भारत में 2 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर तक भी पहुंच सकता है, हालांकि यह पूरी तरह संघर्ष की दिशा पर निर्भर करेगा। वहीं, विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में चांदी के 100 डॉलर प्रति औंस के स्तर को पार करने की संभावना भी बन रही है।
इस वर्ष सोने की कीमतों में हुआ 20% का उछाल
उल्लेखनीय है कि इस वर्ष अब तक सोने की कीमतों में 20% से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है और यह फिर से 5,000 डॉलर प्रति औंस के ऊपर स्थिर हुआ है। जनवरी के अंत में रिकॉर्ड ऊंचाई से गिरावट के बाद भी सोने ने लगातार सातवें महीने बढ़त दर्ज की है, जो 1973 के बाद सबसे लंबी तेजी मानी जा रही है। भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार अनिश्चितता, डॉलर के अवमूल्यन की चिंताएं और फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता को लेकर आशंकाएं इस बहुवर्षीय तेजी के प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।
