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मातृभाषा हमारे जीवन का आईना एवं हमारी पहचान, जिनके विकास हेतु भाषण नहीं, बल्कि सरजमीं पर काम करना जरूरी : प्रो. मुश्ताक अहमद

दरभंगा। मातृभाषा में वैज्ञानिक रूप से सहजता से सीखना एवं सीखाना संभव होता है। सभी विकसित देश अपनी मातृभाषा के माध्यम से ही विकास किया है। सभी शिक्षा नीतियों में मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का सुझाव दिया है। फिर भी आज हम अंग्रेजी की दासता स्वीकार कर रहे हैं। उक्त बातें ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर हिन्दी, मैथिली, उर्दू एवं संस्कृत विभाग द्वारा जुबली हॉल में आयोजित “अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो चन्द्र भानु प्रसाद सिंह ने कही। भारत बहुभाषावाद, बहुसंस्कृतिवाद का देश है, जिसकी इन्द्रधनुषी संस्कृति ही उसके समग्र विकास का मूल आधार है। आज भारत में व्यापार की भाषा हिन्दी है, पर रोजगार की भाषा अंग्रेजी ही है, क्योंकि विज्ञान एवं तकनीक की शिक्षा अंग्रेजी में दी जाती है। मुख्य वक्ता के रूप में विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव एवं सी.एम. कॉलेज के प्रधानाचार्य, प्रो मुश्ताक अहमद ने कहा मातृभाषा हमारे जीवन का आईना एवं हमारी पहचान है, जिनके विकास हेतु भाषण नहीं, बल्कि सरजमीन पर काम करना जरूरी है। कुलपति के प्रभार में प्रो अशोक कुमार मेहता ने अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. संजय कुमार चौधरी की अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की बधाई एवं शुभकामना संदेश रखते हुए छात्र-छात्राओं से अपनी मातृभाषा में मौलिक रचना करने पर बल देते हुए मातृभाषा के महत्त्वों को रेखांकित किया।अतिथियों का स्वागत मिथिला पेंटिंग युक्त पाग, चादर एवं बुके से किया गया। मैथिली-प्राध्यापक सह उप परीक्षा नियंत्रक डॉ सुरेश पासवान के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन संस्कृत- प्राध्यापक सह एनएसएस समन्वयक डॉ आर एन चौरसिया ने किया।

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