डेस्क:न्याय व्यवस्था से जुड़े तीन महत्वपूर्ण घटनाक्रमों ने देश में न्यायिक जवाबदेही, नेतृत्व और समय पर न्याय को लेकर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। एक ओर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की संख्या का विशाल आंकड़ा सामने आया है, दूसरी ओर न्यायिक नेतृत्व को लेकर विनम्रता और सतत सीख की आवश्यकता पर जोर दिया गया है और साथ ही आरक्षित निर्णयों को लंबे समय तक सार्वजनिक न करने की प्रवृत्ति पर कड़ी टिप्पणी की गई है। इन तीनों पहलुओं को साथ रखकर देखने पर न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों और सुधार की दिशाओं की स्पष्ट झलक मिलती है। हम आपको बता दें कि केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद को जानकारी दी है कि वर्ष 2016 से अब तक सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के कार्यरत न्यायाधीशों के खिलाफ कुल 8630 शिकायतें भारत के मुख्य न्यायाधीश को प्राप्त हुई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन शिकायतों की आवृत्ति हाल के वर्षों में बढ़ी है और कुल शिकायतों में से लगभग आधी वर्ष 2022 से 2025 के बीच आई हैं। ये सभी शिकायतें संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों से जुड़ी बताई गई हैं।
