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नूर इनायत खान: भारतीय मूल की वह ब्रिटिश जासूस जिसने नाजियों की नींव हिला दी

डेस्क : द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास में नूर इनायत खान का नाम साहस, बलिदान और अदम्य हिम्मत की मिसाल है। भारतीय मूल की यह ब्रिटिश जासूस नाजी-कब्जे वाले फ्रांस में ब्रिटेन की ओर से भेजी गई पहली महिला वायरलेस ऑपरेटर थीं। बेहद शांत, संवेदनशील और साहित्य से प्रेम करने वाली नूर ने ऐसे समय में हथियार उठाए, जब फासीवाद पूरी दुनिया के लिए खतरा बन चुका था।

शांत स्वभाव, लेकिन असाधारण हिम्मत

नूर इनायत खान का पालन-पोषण एक छोटे, आदर्शवादी और आध्यात्मिक परिवार में हुआ। उन्होंने चाइल्ड साइकोलॉजी में डिग्री हासिल की और अपने करियर की शुरुआत एक लेखिका के रूप में की। वह फ्रेंच और अंग्रेजी में कविताएं और बच्चों की कहानियां लिखा करती थीं। उनके स्वभाव को देखते हुए शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही महिला एक दिन हिटलर की नाजी सेना के खिलाफ खुफिया जंग लड़ेगी।
फ्रांस में ब्रिटेन की पहली महिला वायरलेस ऑपरेटर
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नूर ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया। वह ब्रिटेन की ओर से नाजी-कब्जे वाले फ्रांस में भेजी गई पहली महिला वायरलेस ऑपरेटर बनीं। अपने सरल और सौम्य व्यक्तित्व के बावजूद, उन्होंने फ्रांसीसी प्रतिरोध आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। नूर द्वारा भेजे गए गुप्त संदेशों ने नाजी शासन को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई।

पकड़े जाने की कीमत चुकानी पड़ी जान से
नूर की बहादुरी की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। लंबे समय तक गेस्टापो से बचती रहीं, लेकिन आखिरकार 30 साल की उम्र में नाजी सीक्रेट पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। कड़ी पूछताछ, यातनाओं और कैद के बावजूद नूर ने कोई भी गोपनीय जानकारी साझा नहीं की। वर्ष 1944 में नाजियों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया।

आज कैसे याद की जाती हैं नूर इनायत खान
मैसूर के शासक टीपू सुल्तान की वंशज नूर इनायत खान को फ्रांस ने एक विशेष पोस्टेज स्टैम्प जारी कर सम्मानित किया है। वह फ्रांस की ओर से पोस्टेज स्टैम्प से सम्मानित होने वाली एकमात्र भारतीय मूल की महिला हैं। यह सम्मान युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर जारी किया गया, जिसमें 12 युद्ध नायकों और नायिकाओं को शामिल किया गया।

बायोग्राफर श्राबनी बसु की प्रतिक्रिया

नूर की जीवनी ‘स्पाई प्रिंसेस: द लाइफ ऑफ नूर इनायत खान’ की लेखिका श्राबनी बसु ने कहा, यह खुशी की बात है कि फ्रांस ने नूर इनायत खान को पोस्टेज स्टैम्प के जरिए सम्मानित किया है, खासकर तब जब यह युद्ध की 80वीं वर्षगांठ से जुड़ा है। उन्होंने आगे कहा, नूर ने फासीवाद के खिलाफ लड़ाई में अपनी जान कुर्बान कर दी। ब्रिटेन ने 2014 में उनके जन्म की 100वीं वर्षगांठ पर उन्हें सम्मानित किया था। अब वक्त आ गया है कि भारत भी, जो उनके पूर्वजों का देश है, उन्हें पोस्टेज स्टैम्प जारी कर सम्मान दे।”

नूर इनायत खान की कहानी

1914 में रूस के मॉस्को शहर में जन्मी नूर-उन-निसा इनायत खान की परवरिश बेहद अनोखी रही। उनके पिता इनायत खान एक सूफी फकीर और संगीतकार थे, जो सूफीवाद को पश्चिम तक ले गए। उनकी मां अमेरिकी थीं। नूर का बचपन लंदन और पेरिस में बीता, जहां उन्होंने संगीत, साहित्य और आध्यात्मिक शिक्षा पाई।

जासूसी की राह तक कैसे पहुंचीं

नूर ने छह साल तक संगीत की शिक्षा ली, चाइल्ड साइकोलॉजी की पढ़ाई की और हिंदी भी सीखी। उनका सपना बच्चों के लिए अखबार शुरू करने का था। लेकिन 1940 में फासीवाद के बढ़ते खतरे और फ्रांस के पतन ने उन्हें झकझोर दिया। इसके बाद वह अपने परिवार के साथ इंग्लैंड चली गईं और जुल्म के खिलाफ सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया।

SOE में चयन और विवाद

नूर विमेंस ऑक्जीलियरी एयर फोर्स (WAAF) में शामिल हुईं, जहां उनकी फ्रेंच भाषा पर पकड़ और स्किल्स ने स्पेशल ऑपरेशंस एग्जीक्यूटिव (SOE) का ध्यान खींचा। हालांकि, उनके चयन को लेकर विवाद भी हुआ। कई अफसरों को शक था कि उनका शांत स्वभाव और नाज़ुक व्यक्तित्व उन्हें एक आसान निशाना बना सकता है।

पेरिस में आखिरी वायरलेस लिंक

16 जून 1943 को नूर को एक खतरनाक मिशन पर फ्रांस भेजा गया। वह पेरिस में ब्रिटेन और फ्रांसीसी रेजिस्टेंस के बीच आखिरी वायरलेस लिंक बन गईं। लगातार जगह बदलते हुए, छतों और आंगनों से ट्रांसमीटर चलाकर उन्होंने जरूरी सूचनाएं लंदन तक पहुंचाईं। चार महीनों तक गेस्टापो से बचने के बाद अक्टूबर 1943 में नूर के साथ धोखा हुआ। माना जाता है कि किसी करीबी ने ही उनका भेद खोल दिया। गिरफ्तारी के दौरान उन्होंने जमकर विरोध किया, जिससे गेस्टापो अधिकारी भी हैरान रह गए।

यातना, जेल और बलिदान

गिरफ्तारी के बाद नूर से पांच हफ्तों तक पूछताछ की गई। उन्होंने दो बार जेल से भागने की कोशिश भी की, लेकिन असफल रहीं। अंततः उन्हें जर्मनी भेज दिया गया, जहां अमानवीय यातनाएं दी गईं। 13 सितंबर 1944 को नूर इनायत खान को फांसी दे दी गई। वह मात्र 30 वर्ष की थीं। नूर इनायत खान आज भी साहस, बलिदान और इंसानियत के लिए खड़े होने की प्रेरणा हैं। एक लेखिका से लेकर जासूस बनने तक का उनका सफर यह साबित करता है कि असली बहादुरी हथियारों में नहीं, बल्कि आत्मा की मजबूती में होती है।

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