स्त्रीत्व व सृजन स्त्रीत्व है सम्पूर्ण स्वयं में है परिपूर्ण उसे नहीं किसी की चाह उसे नहीं किसी की परवाह परन्तु सृजन उसके प्राणों में है किन्तु सृजन उसकी श्वासों में है और सृजन क्षमता का दुरुपयोग ही उसे बना देता है अत्यन्त दीन कर देता है उसके जीवन को रस विहीन सृजन ऊर्जा का […]
