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हजार साल पहले भारत के सभ्यता की पुनर्वापसी का संदेश है सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, सोमनाथ मंदिर भारतीय संस्कृति में आस्था की तीर्थस्थली : डा गोपाल जी ठाकुर

दरभंगा। सनातन संस्कृति और सभ्यता में सोमनाथ मंदिर को आस्था की तीर्थस्थली माना जाता है। सदियों से बार बार हमले के बाबजूद यह मंदिर भारत की अटूट भावना का प्रतीक है।  महमूद गजनी के द्वारा 6- 8 जनवरी 1026 ई0 में मंदिर के ऊपर हुए हमले तथा इसको खंडित करने की घटना के हजार साल पूरे होने पर सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के रूप में पीएम श्री नरेंद्र मोदी के द्वारा इस मंदिर में की गई पूजा तथा देश स्तर पर सभी शिवालयों में सनातन धर्मावलंबियों द्वारा पूजा पाठ शंखवादन भजन कीर्तन आदि का किया जाना सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रखर उदाहरण है जो देश के एक सौ चालीस करोड़ लोगों के लिए आस्था और गौरव का प्रतीक है।

भाजपा सांसद सह लोकसभा में पार्टी सचेतक डा गोपाल जी ठाकुर ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों तथा भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर शनिवार को महाराष्ट्र के कांदिवली के वार्ड – 23 स्थित शिवालय में पूजा करने के बाद उपरोक्त उदगार व्यक्त किए।

सांसद डा ठाकुर ने सोमनाथ स्वाभिमान पर्व को हजार साल पहले की भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति की पुनर्स्थापना का संदेश बताते हुए कहा कि यह स्वाभिमान पर्व न केवल एक मंदिर की कथा का परिचायक है बल्कि भारत माता के उन अनगिनत सपूतों के अदम्य साहस का इतिहास भी है जिन्होंने देश की सभ्यता संस्कृति और धर्म की रक्षा की तथा जिनके लिए सभ्यता संस्कृति की रक्षा सदैव सर्वोच्च प्राथमिकता रही।

सांसद डा ठाकुर ने सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाए जाने के निहितार्थो को रेखांकित करते हुए कहा कि 1026 ईo में 6 से 8 जनवरी तक सुल्तान महमूद गजनी ने इस मंदिर का अपमान किया तथा मंदिर को खंडित कर मंदिर को भारी क्षति पहुंचाई तथा शिवलिंग का तोड़कर चारो ओर आग लगा दी गई जिसकी रक्षा के लिए 50 हजार से अधिक हिन्दू भक्तों ने अपने प्राणों की आहुती देकर यह साबित किया कि प्राण रक्षा से पहले सम्मान की रक्षा आवश्यक है।

सांसद डा ठाकुर ने मंदिर के इतिहास तथा इसके पुनर्स्थापना के संबंध में चर्चा करते हुए कहा कि दक्ष प्रजापति की श्राप से मुक्ति के लिए चंद्रमा सहित अन्य देवी देवताओं के आग्रह पर भगवान भोलेनाथ माता पार्वती के साथ यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए थे तथा महमूद गजनी के द्वारा इस पर हुए हमले के बाद आजादी के बाद देश के पहले गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने इस मंदिर का नव निर्माण कराया था जिसे देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 1 दिसबर 1955 को राष्ट्र को समर्पित किया था

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