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कभी शान थी, आज गायब: बाजारों से लुप्त राजकीय मछली मांगुर

रक्सौल (पूर्वी चंपारण)। Mangur Fish Bihar:राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2011 में राजकीय मछली घोषित की गई मांगुर अब स्थानीय बाजारों से लगभग गायब हो चुकी है। कभी देसी मछलियों से गुलजार रहने वाले बाजारों में अब यह मछली कभी-कभार ही दिखाई देती है।इसके अभाव में उपभोक्ताओं को दूसरे राज्यों से लाई गई बर्फ वाली मछलियों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। विशेषज्ञों और स्थानीय मछुआरों का मानना है कि सरकारी उदासीनता देसी मछलियों के अस्तित्व पर संकट का सबसे बड़ा कारण बन गई है।मत्स्य विभाग की ओर से समय पर आहार, दवा और खाद का प्रबंधन नहीं होने, वैज्ञानिक देखभाल के अभाव तथा तालाबों के जीर्णोद्धार की अनदेखी से उत्पादन लगातार घटता गया।

देसी मछलियों के लुप्त होने के पीछे चौर-डबरा का समाप्त होना, नदियों, नहरों और पईनों का सूखना भी बड़ी वजह मानी जा रही है। प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में ठोस पहल नहीं होने से पारंपरिक मछलियों का प्रजनन प्रभावित हुआ है। साथ ही जैविक और रासायनिक संरक्षण उपायों का भी समुचित उपयोग नहीं किया जा रहा है।

करीब एक दशक पहले तक बाजारों में कवई, मारा, इचना, सौरा, गराई, सुहा, सिंगी, बुआई, बुला और झींगा जैसी देसी मछलियों की भरमार रहती थी। वर्तमान में ये प्रजातियां बाजारों से लगभग गायब हो चुकी हैं। वहीं मांगुर और पटेया अब सिर्फ पुराने दिनों की याद बनती जा रही हैं।

 

देसी मछलियों के उत्पादन में भारी कमी के चलते बाजार अब दूसरे राज्यों से आने वाली मछलियों से भरे हुए हैं। त्योहारों और विशेष अवसरों पर इनकी मांग और बढ़ जाती है। फिलहाल मत्स्य विभाग कुछ चयनित प्रजातियों के पालन पर ही अधिक जोर दे रहा है।

 

राज्य सरकार रोहू, कतला, नैनी सहित पांच प्रमुख देसी मछलियों के उत्पादन को बढ़ावा दे रही है, ताकि मत्स्य उत्पादन में वृद्धि की जा सके।

 

 

 

 

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