- नई दिल्ली:भारतीय नौसेना की अंडरवाटर स्ट्राइक क्षमता लंबे समय से एक संक्रमणकाल से गुजर रही है। पुराने प्लेटफॉर्म, धीमी रिप्लेसमेंट प्रक्रिया और भविष्य की परियोजनाओं में देरी के बीच रूस का नया प्रस्ताव एक अहम मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।रूस ने भारत को अपनी नौसेना के रिजर्व से तीन रीफर्बिश्ड किलो-क्लास डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां देने का ऑफर किया है, जिसकी कुल लागत एक अरब डॉलर से कम बताई जा रही है।यह प्रस्ताव ऐसे समय पर आया है जब भारत को 2030 के आसपास अपने पारंपरिक सबमरीन बेड़े में गंभीर कमी का अंदेशा है। रूस का यह कदम भारत के लिए एक इंटरिम सॉल्यूशन के तौर पर पेश किया जा रहा है, जिससे नई पनडुब्बियों के आने तक ऑपरेशनल गैप को भरा जा सके।
पुतिन की यात्रा के बाद तेज़ हुई पेशकश
दिलचस्प बात यह है कि यह ऑफर दिसंबर 2025 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की प्रस्तावित भारत यात्रा के बाद सामने आया। उसी दौरान रूस ने 2028 तक एक परमाणु-संचालित अकुला-क्लास अटैक सबमरीन को लीज पर देने का भरोसा भी दिया था। यानी रूस ने भारत के सामने लंबी अवधि के परमाणु विकल्प के साथ-साथ तुरंत उपलब्ध पारंपरिक विकल्प भी रख दिया है।
मारक क्षमता में भी इज़ाफा
रिपोर्ट के मुताबिक इन सबमरीन में Klub-S मिसाइल सिस्टम को इंटीग्रेट किया जाएगा, जो Kalibr क्रूज़ मिसाइल का एक्सपोर्ट वर्जन है। यह मिसाइल टॉरपीडो ट्यूब से लॉन्च होकर 220 से 300 किलोमीटर की दूरी तक ज़मीनी और समुद्री लक्ष्यों को निशाना बना सकती है। इससे भारतीय नौसेना की अंडरवाटर स्ट्राइक रेंज और ज्यादा घातक हो जाएगी।
घटते बेड़े की चिंता
वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास लगभग 16 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं, जिनमें रूसी मूल की सिंधुघोष-क्लास, जर्मन शिशुमार-क्लास और फ्रेंच डिजाइन की कलवरी-क्लास सबमरीन शामिल हैं। 1980-90 के दशक में शामिल की गई किलो-क्लास पनडुब्बियां अब उम्र से जुड़ी दिक्कतों का सामना कर रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में तीन किलो-क्लास पनडुब्बियां रिटायर भी हो चुकी हैं, जिससे संख्या में गिरावट आई है। रूस का यह नया ऑफर असल में उन्हीं रिटायर जहाजों का वन-टू-वन रिप्लेसमेंट माना जा रहा है, ताकि बेड़े की न्यूनतम ताकत बनी रहे।
रणनीतिक संकेत
यह प्रस्ताव सिर्फ सैन्य जरूरतों तक सीमित नहीं है। इसे भारत-रूस रक्षा सहयोग के निरंतर मजबूत रिश्तों और वैश्विक भू-राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। जहां एक तरफ अमेरिका और चीन इस घटनाक्रम को ध्यान से देख रहे हैं, वहीं भारत के पास यह मौका है कि वह अपनी तात्कालिक जरूरतों और दीर्घकालिक रणनीति के बीच संतुलन बना सके।
