प्रादेशिक बिहार

मैथिली अकादमी : सरकारी उदासीनता और संस्थागत पतन (निशांत झा)

संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल मैथिली भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए स्थापित मैथिली अकादमी, पटना आज स्वयं सरकारी उदासीनता का शिकार बन चुकी है। जिस संस्था को भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र होना चाहिए था, वहां आज ताला लटका हुआ है। यह दृश्य केवल प्रशासनिक विफलता का प्रतीक नहीं, बल्कि यह बताता है कि सरकारें भाषाई विरासत को लेकर कितनी असंवेदनशील हो सकती हैं।

सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जब राज्य सरकार अन्य भाषाई अकादमियों को नियमित रूप से संचालित कर सकती है, तो फिर मैथिली अकादमी के साथ यह भेदभाव क्यों? क्या संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होना केवल एक औपचारिक सम्मान भर रह गया है, जिसका ज़मीनी स्तर पर कोई अर्थ नहीं रह गया?

विडंबना यह है कि मैथिली अकादमी की वर्तमान दुर्दशा किसी अपरिहार्य परिस्थिति का परिणाम नहीं है। इसका इतिहास गवाह है कि सीमित संसाधनों, प्रशासनिक बाधाओं और राजनीतिक उपेक्षा के बावजूद भी यह संस्था प्रभावी ढंग से काम कर सकती है। 06 अगस्त 2010 से 05 अगस्त 2013 तक का कालखंड इसका जीवंत उदाहरण है। तत्कालीन अध्यक्ष पंडित कमलाकांत झा के नेतृत्व में लगभग निष्क्रिय हो चुकी अकादमी ने नई ऊर्जा प्राप्त की। उस दौर में पुस्तक प्रकाशन, संगोष्ठियाँ, शोध और साहित्यिक गतिविधियाँ निरंतर चलती रहीं। स्वयं राज्य सरकार ने उस कार्यकाल की सराहना की थी।

आज जब अकादमी बंद पड़ी है, तब यह सवाल अनिवार्य रूप से उठता है कि यदि पहले ऐसा संभव था, तो आज क्यों नहीं? इसका उत्तर संसाधनों की कमी में नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में छिपा है। कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रतिनियोजन और समायोजन जैसे मुद्दों को बहाना बनाकर संस्था को निष्क्रिय कर देना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं है।

सरकारी तंत्र यह भूल जाता है कि संस्थाएँ केवल भवनों और फाइलों से नहीं चलतीं। वे चलती हैं जिम्मेदार नेतृत्व, स्पष्ट नीतियों और निरंतर निगरानी से। जब पदों पर बैठे लोग अपने दायित्वों को औपचारिकता मानकर निभाते हैं, तब संस्थाएँ धीरे-धीरे खोखली हो जाती हैं। मैथिली अकादमी इसका ताज़ा उदाहरण है।

पंडित कमलाकांत झा द्वारा लिखित आलेख ‘मैथिली अकादमी ओ हमर कार्यकाल’, जो विद्यापति सेवा संस्थान की स्मारिका ‘अर्पण’ में प्रकाशित हुआ, इस पूरे परिदृश्य का एक दस्तावेजी प्रमाण है। उसमें यह स्पष्ट रूप से दर्ज है कि किस तरह सीमित संसाधनों के बावजूद अकादमी को सक्रिय रखा गया और किन प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। यह आलेख आज के नीति-निर्माताओं के लिए एक आईना है यदि वे उसमें झांकने का साहस करें।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि अकादमी में ताला लगना किसी आकस्मिक निर्णय का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही सरकारी उपेक्षा की परिणति है। यह उपेक्षा केवल एक संस्था तक सीमित नहीं है; इसका असर मैथिली भाषा, साहित्य और आने वाली पीढ़ियों तक जाएगा। जब संस्थागत समर्थन समाप्त हो जाता है, तब भाषा केवल भावनात्मक गर्व तक सिमट कर रह जाती है।

अब समय आ गया है कि सरकार प्रतीकात्मक सम्मान से आगे बढ़े। मैथिली अकादमी को तत्काल पुनः सक्रिय किया जाए, अकादमी में पुनः अध्यक्ष, निदेशक और कर्मचारियों की नियुक्ति हो, और उसे नियमित बजट व प्रशासनिक संरक्षण मिले। अन्यथा इतिहास यह दर्ज करेगा कि एक समृद्ध भाषा की शासकीय संस्था को लापरवाही और उदासीनता ने धीरे-धीरे खत्म कर दिया।

मैथिली अकादमी का प्रश्न केवल भाषा का नहीं, बल्कि सरकारी जवाबदेही का प्रश्न है। यदि सरकार आज भी नहीं चेती, तो यह चुप्पी स्वयं एक अपराध के रूप में दर्ज की जाएगी।

 

निशांत झा

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