अंतरराष्ट्रीय

पाकिस्तान-सऊदी अरब ने आक्रामकता के खिलाफ संयुक्त रक्षा के लिए किया समझौता

डेस्क : हाल ही में सऊदी अरब और पाकिस्तान ने एक ऐसे रक्षा समझौते पर हाथ मिलाया है, जिसने पूरी दुनिया, खासकर भारत का ध्यान अपनी ओर खींचा है. बुधवार को रियाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इस समझौते पर मुहर लगाई. सीधे शब्दों में कहें तो यह एक “एक-दूसरे की रक्षा का वादा” है. इस समझौते के तहत, अगर कोई भी देश पाकिस्तान या सऊदी अरब पर हमला करता है, तो उसे दोनों देशों पर किया गया हमला माना जाएगा. इसके बाद दोनों देश मिलकर उस हमले का जवाब देंगे. यह कुछ-कुछ NATO (नाटो) देशों के समझौते जैसा है, जहां एक सदस्य देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है. हालांकि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सैन्य रिश्ते दशकों पुराने हैं, लेकिन पहली बार इसे एक औपचारिक समझौते का रूप दिया गया है.

यह समझौता भारत के लिए कई तरह से महत्वपूर्ण हो जाता है. एक तरफ जहां पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते तनावपूर्ण रहते हैं, वहीं दूसरी तरफ सऊदी अरब भारत का एक अहम रणनीतिक और व्यापारिक साझेदार है.

समझौते के तुरंत बाद, सऊदी अधिकारियों ने यह साफ किया कि भारत के साथ उनके रिश्ते “पहले से कहीं ज्यादा मजबूत” हैं और वे इसे और बेहतर बनाना चाहते हैं. इससे पता चलता है कि सऊदी अरब, पाकिस्तान को सैन्य सुरक्षा का आश्वासन देते हुए भारत के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को खराब नहीं करना चाहता है. इस समझौते से दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है. अब भारत को पाकिस्तान के साथ किसी भी बड़े सैन्य टकराव की स्थिति में सऊदी अरब के किरदार को भी ध्यान में रखना होगा. सऊदी अरब भारत को तेल सप्लाई करने वाले सबसे बड़े देशों में से एक है. भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए यह तेल बहुत ज़रूरी है. भारत और सऊदी अरब के रिश्ते सिर्फ तेल तक ही सीमित नहीं, बल्कि निवेश और व्यापार के कई क्षेत्रों में फैले हुए हैं.

जब एक सऊदी अधिकारी से पूछा गया कि क्या यह रक्षा समझौता पाकिस्तान के परमाणु हथियारों पर भी लागू होता है, तो उन्होंने सीधा जवाब देने से इनकार कर दिया. उनकी यह चुप्पी इस समझौते का सबसे संवेदनशील पहलू है. अगर यह समझौता परमाणु सुरक्षा को भी कवर करता है, तो यह भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय हो सकता है.

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ रहा है, खासकर इज़राइल और हमास के बीच हालिया संघर्ष के बाद. सऊदी अरब शायद इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है और अपने सहयोगियों को यह संदेश देना चाहता है कि वह उनकी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.

कुल मिलाकर, यह समझौता भारत के लिए एक “इंतजार करो और देखो” वाली स्थिति बनाता है. एक तरफ पाकिस्तान को सऊदी अरब जैसा शक्तिशाली साथी मिल गया है, तो दूसरी तरफ सऊदी अरब भी भारत के साथ अपनी दोस्ती को दांव पर नहीं लगाना चाहेगा. भारत को अपनी कूटनीति से सऊदी अरब के साथ संबंधों को मजबूत बनाए रखना होगा, साथ ही इस नए पाकिस्तान-सऊदी गठबंधन पर भी पैनी नजर रखनी होगी.

 

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