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निराशा से आशा की ओरः आत्महत्या के खिलाफ जंग

आत्महत्या जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है, यह मनुष्य होने के अर्थ और गरिमा को धूमिल करती है। जब जीवन जीने का साहस कमज़ोर पड़ता है तो व्यक्ति निराशा और अंधकार में डूबकर स्वयं को समाप्त करने की ओर बढ़ता है।
दुनिया में आत्महत्या आज एक गहरी एवं विडम्बनापूर्ण वैश्विक चुनौती बन चुकी है। हर साल लाखों लोग अपनी ही जिंदगी से हार मान लेते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल लगभग 7.2 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। यह सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि सामाजिक, भावनात्मक और आर्थिक संकट भी है। 15 से 29 वर्ष की आयु वर्ग में मृत्यु का चौथा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या है। यही वजह है कि हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। 2024 से 2026 तक इसकी थीम “चेंजिंग द नैरेटिव ऑन सुसाइड” रखी गई है, जिसका उद्देश्य है आत्महत्या पर खामोशी तोड़कर इसे एक निष्क्रिय विषय से संवाद और सहयोग का सक्रिय विषय बनाना। आत्महत्या पर दृष्टिकोण का यह बदलाव आत्महत्या के बारे में लोगों की सोच और बातचीत के तरीके को चुनौती देता है, खुले और ईमानदार संवाद को बढ़ावा देता है जो कलंक को तोड़ता है और समझ को बढ़ावा देता है। आत्महत्या के अलावा जीवन में और भी बेहतर विकल्प हैं। इसके अलावा एक ऐसी समाज-व्यवस्था को बढ़ावा देना है जहां लोग मदद लेने में हिचहिचाए नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहयोग के लिये आगे आये। निश्चित रूप से खुदकुशी सबसे तकलीफदेह हालात के सामने हार जाने का नतीजा होती है और ऐसा फैसला करने वालों के भीतर वंचना का अहसास, उससे उपजे तनाव, दबाव और दुख का अंदाजा लगा पाना दूसरों के लिए मुमकिन नहीं है। आत्महत्या शब्द जीवन से पलायन का डरावना सत्य है जो दिल को दहलाता है, डराता है, खौफ पैदा करता है, दर्द देता है आत्महत्या जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है, यह मनुष्य होने के अर्थ और गरिमा को धूमिल करती है। जब जीवन जीने का साहस कमज़ोर पड़ता है तो व्यक्ति निराशा और अंधकार में डूबकर स्वयं को समाप्त करने की ओर बढ़ता है। वैश्विक स्तर पर यह एक गंभीर समस्या है, दुनिया भर से आते नए आंकड़े इस चुनौती की गंभीरता को और उजागर करते हैं। 2021 में अनुमानित 7.27 लाख आत्महत्याएं हुईं और विश्व में हर 43 सेकेंड में कोई एक व्यक्ति खुदकुशी कर रहा है। 73 प्रतिशत आत्महत्याएं निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों में होती हैं और सबसे अधिक असर युवा और गृहिणियों पर पड़ता है। भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2021 की रिपोर्ट बताती है कि आत्महत्या करने वाली महिलाओं में 51.5 प्रतिशत गृहिणियां थीं। आत्महत्या की दर दो दशकों में 7.9 से बढ़कर 10.3 प्रति एक लाख हो गई है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में पारिवारिक कलह आत्महत्या का बड़ा कारण है। युवा वर्ग की महत्वाकांक्षा क्षमता से अधिक हो चुकी है, पारिवारिक सामंजस्य खत्म हो गया है, असफलता का डर और तनाव सहने की क्षमता कम हो गई है। यही कारण है कि पढ़ाई के दबाव, नौकरी में असफलता, रिश्तों के टूटने और आर्थिक अभाव से युवा और किशोर आत्महत्या की ओर धकेले जा रहे हैं

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